पाकिस्तान(HRIDAY STAMBH);पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसियों पर गंभीर आरोप, मंजूर पश्तीन बोले- खुद उग्रवादी समूह बनाकर आतंकवाद के नाम पर चलाए जा रहे सैन्य अभियान हेग जस्टिस डायलॉग-2026 में पश्तून नेता का बड़ा खुलासा; सेना पर आतंकियों को फंडिंग, ट्रेनिंग और संरक्षण देने का आरोप, बोले- सैन्य अभियानों की आड़ में प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की कोशिश
हेग/इस्लामाबाद। पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसियां एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में हैं। पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (PTM) के प्रमुख मंजूर पश्तीन ने अंतरराष्ट्रीय मंच से पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि देश की सेना और खुफिया एजेंसियां ही पश्तून बहुल इलाकों में सशस्त्र उग्रवादी समूहों को तैयार करने, उन्हें आर्थिक मदद देने और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने में भूमिका निभाती रही हैं। पश्तीन का दावा है कि इन समूहों की गतिविधियों को बाद में आतंकवाद के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का आधार बनाया जाता है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन अभियानों के पीछे सुरक्षा के अलावा खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य भी जुड़े हुए हैं। मंजूर पश्तीन ने ये आरोप ‘हेग जस्टिस डायलॉग-2026’ में अपने संबोधन के दौरान लगाए। उन्होंने पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और आसपास के पश्तून बहुल क्षेत्रों में पिछले दो दशकों से जारी हिंसा, सैन्य अभियानों, जबरन विस्थापन और नागरिकों के लापता होने के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने उठाया। उनके भाषण ने पाकिस्तान की सेना की कार्यप्रणाली और आतंकवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों की वास्तविक मंशा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
23 वर्षों से संघर्ष झेल रहा पश्तून समुदाय
पश्तीन ने अपने संबोधन में कहा कि पिछले 23 वर्षों के दौरान लाखों पश्तून नागरिकों को लगातार संघर्ष और असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताना पड़ा है। सैन्य अभियानों और सशस्त्र हिंसा के कारण हजारों लोगों की जान गई, बड़ी संख्या में लोग लापता हुए और लाखों नागरिकों को अपने घर छोड़कर दूसरे स्थानों पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई चलने के बावजूद खैबर पख्तूनख्वा में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी है। उनका सवाल था कि यदि इन अभियानों का उद्देश्य आतंकवाद समाप्त करना और आम नागरिकों को सुरक्षित करना था तो फिर इतने वर्षों बाद भी क्षेत्र में हिंसा और अस्थिरता क्यों बनी हुई है?
सेना और खुफिया एजेंसियों पर उग्रवादी संगठन तैयार करने का आरोप
मंजूर पश्तीन ने पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसियों पर सबसे गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि खैबर पख्तूनख्वा में सशस्त्र समूहों को तैयार करने, उन्हें वित्तीय सहायता देने और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने में सरकारी सुरक्षा तंत्र की भूमिका रही है। उनका आरोप है कि इन समूहों की मौजूदगी और गतिविधियों को बाद में सुरक्षा संकट के रूप में पेश किया जाता है। इसके बाद आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर सैन्य अभियान चलाए जाते हैं। पश्तीन के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया का खामियाजा आम पश्तून नागरिकों को भुगतना पड़ता है, जिनके घर तबाह होते हैं, परिवार बिछड़ते हैं और उन्हें अपनी जमीन छोड़कर पलायन करना पड़ता है। हालांकि, ये आरोप मंजूर पश्तीन के हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। पाकिस्तान की सेना की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
2004 से अब तक दर्जनों बड़े सैन्य अभियान चलाने का दावा
पश्तीन ने अपने भाषण में बताया कि वर्ष 2004 से पाकिस्तान की सेना खैबर पख्तूनख्वा और आसपास के क्षेत्रों में दर्जनों बड़े सैन्य अभियान तथा हजारों छोटे लक्षित अभियान चला चुकी है। इन अभियानों का घोषित उद्देश्य आतंकवादी संगठनों और सशस्त्र समूहों का सफाया करना रहा है।
लेकिन पश्तीन का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर सैन्य कार्रवाई के बावजूद क्षेत्र में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कायम नहीं हो सकी। उनके अनुसार, सैन्य अभियानों ने स्थानीय आबादी की समस्याओं को कम करने के बजाय विस्थापन, भय और असुरक्षा को और बढ़ाया है।
खनिज संपदा से भरपूर क्षेत्रों पर कब्जे की साजिश का आरोप
मंजूर पश्तीन ने पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई के पीछे आर्थिक हितों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि आतंकवाद विरोधी अभियानों का इस्तेमाल खनिज संपदा से भरपूर पश्तून क्षेत्रों में स्थानीय आबादी को हटाने और वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया जा रहा है।
उनके मुताबिक खैबर पख्तूनख्वा और आसपास के क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है। ऐसे में सैन्य अभियानों के जरिए स्थानीय लोगों को विस्थापित करना और संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि, इस कथित उद्देश्य के समर्थन में प्रस्तुत किए गए विशिष्ट साक्ष्यों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
भाषण के दौरान पाकिस्तानी प्रतिनिधियों ने छोड़ी कार्यवाही
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि मंजूर पश्तीन के संबोधन के दौरान पाकिस्तान के राजनयिक आसिफ दुर्रानी और वहां मौजूद पाकिस्तानी राजदूत के कार्यवाही छोड़कर चले जाने की जानकारी सामने आई है।
इस घटनाक्रम को पाकिस्तान के लिए असहज स्थिति के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने देश की सेना और खुफिया एजेंसियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों के बीच पाकिस्तानी प्रतिनिधियों का कार्यवाही से बाहर जाना चर्चा का विषय बन गया है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया पश्तून नागरिकों के अधिकारों का मुद्दा
पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट लंबे समय से पाकिस्तान में पश्तून समुदाय के मानवाधिकारों, सुरक्षा, जबरन गुमशुदगी और सैन्य अभियानों के दौरान नागरिकों के साथ कथित ज्यादतियों के मुद्दे उठाता रहा है।
मंजूर पश्तीन का कहना है कि पश्तून समुदाय को दशकों से हिंसा और सैन्य कार्रवाइयों के बीच जीवन बिताना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर आम नागरिकों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।
हेग जस्टिस डायलॉग-2026 में उठाए गए इन सवालों ने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा नीति, सैन्य अभियानों और पश्तून नागरिकों के अधिकारों को लेकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बहस को हवा दी है।
अब सवाल यह है कि पाकिस्तान में दो दशक से अधिक समय तक सैन्य अभियान चलने के बावजूद पश्तून बहुल क्षेत्रों में स्थायी शांति क्यों स्थापित नहीं हो सकी? क्या वहां की आम आबादी को वास्तव में आतंकवाद से सुरक्षा मिल रही है या वह आतंकवाद और सैन्य कार्रवाई के बीच पिसने को मजबूर है? मंजूर पश्तीन के आरोपों ने पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था के सामने ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका जवाब केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा से ही दिया जा सकता है।