जालोर,
जालोर(HRIDAY STAMBH);
राजस्थान के जालोर जिले से चिकित्सा व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। यहां महज आठवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाला एक व्यक्ति कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के सहारे डॉक्टर बन गया और अस्पताल का संचालन करने लगा। मामला रानीवाड़ा क्षेत्र का है, जहां भास्कर हॉस्पिटल के संचालक नानजीराम चौधरी को लेकर राजस्थान पुलिस के विशेष अभियान दल (एसओजी) की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जांच के मुताबिक, आरोपी ने दसवीं और बारहवीं की कथित फर्जी अंकसूचियों से लेकर एमबीबीएस की डिग्री और स्त्री रोग एवं प्रसूति विज्ञान के डिप्लोमा तक के दस्तावेज तैयार करवाए थे। इतना ही नहीं, राजस्थान मेडिकल काउंसिल में कथित तौर पर 30 लाख रुपये की रिश्वत देकर डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराने का आरोप भी सामने आया है।
पर्चियां काटने से शुरू हुआ सफर, बन गया अस्पताल का मालिक
एसओजी की जांच में नानजीराम चौधरी की पुरानी गतिविधियों को लेकर भी जानकारी सामने आई है। बताया गया है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच वह रानीवाड़ा में एक निजी चिकित्सक के क्लीनिक पर ओपीडी काउंटर में मरीजों की पर्चियां काटने का काम करता था। इसके बाद उसने कुछ समय तक रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर काम किया। वर्ष 2014 में वह राजदेव हॉस्पिटल के ओपीडी काउंटर पर काम करने लगा।
आरोप है कि अस्पताल से जुड़ने के बाद उसने वर्ष 2015 में राजदेव हॉस्पिटल खरीद लिया और 2016 में उसका नाम बदलकर भास्कर हॉस्पिटल कर दिया। धीरे-धीरे अस्पताल का विस्तार किया गया और वहां चिकित्सकों की नियुक्ति भी की गई। जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि अस्पताल के संचालन और चिकित्सा सेवाओं में आरोपी की वास्तविक भूमिका क्या थी तथा उसने किन-किन मरीजों का इलाज किया।
आठवीं पास होने के बावजूद एमबीबीएस और गायनेकोलॉजी के दस्तावेज
जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य आरोपी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर सामने आया है। एसओजी के अनुसार, नानजीराम ने केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसके बावजूद उसके पास दसवीं और बारहवीं की अंकसूचियां, एमबीबीएस की डिग्री और स्त्री रोग एवं प्रसूति विज्ञान में डिप्लोमा से संबंधित दस्तावेज मिले।
आरोप है कि उसने आंध्र प्रदेश बोर्ड के नाम से दसवीं और बारहवीं की फर्जी अंकसूचियां तैयार करवाईं। इसके बाद कानपुर की रामा यूनिवर्सिटी के नाम से एमबीबीएस की डिग्री और मुंबई स्थित कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स के नाम से डीजीओ डिप्लोमा से संबंधित दस्तावेज हासिल किए।
जब संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से इन दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया तो कई प्रमाणपत्र कथित तौर पर फर्जी पाए गए। डिप्लोमा से संबंधित प्रमाणपत्र, अलॉटमेंट लेटर, पासिंग सर्टिफिकेट और अन्य दस्तावेजों की वैधता पर भी सवाल खड़े हुए।
30 लाख रुपये की रिश्वत देकर पंजीकरण कराने का आरोप
इस मामले में सबसे गंभीर आरोप राजस्थान मेडिकल काउंसिल में कथित मिलीभगत को लेकर है। सामने आई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नानजीराम चौधरी ने करीब 30 लाख रुपये की रिश्वत देकर मेडिकल काउंसिल में अपना पंजीकरण कराया था। आरोप है कि मेडिकल काउंसिल के तत्कालीन पदाधिकारियों और कुछ कर्मचारियों से संपर्क स्थापित कर उसने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पंजीकरण हासिल किया।
हालांकि, रिश्वत की रकम और इस पूरे कथित लेनदेन की आधिकारिक पुष्टि तथा इसमें शामिल व्यक्तियों की भूमिका की जांच अभी महत्वपूर्ण विषय है। एसओजी इस बात की पड़ताल कर रही है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पंजीकरण किस प्रक्रिया से हुआ और इसमें किन लोगों ने मदद की।
खुद ही नहीं बना डॉक्टर, 18 अन्य लोगों को भी पंजीकरण दिलाने का आरोप
जांच में यह भी सामने आया है कि नानजीराम कथित तौर पर केवल अपने लिए ही फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल नहीं कर रहा था, बल्कि अन्य लोगों को भी डॉक्टर के रूप में पंजीकरण दिलाने में मदद कर रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे करीब 18 अन्य लोगों की भूमिका सामने आई है।इस खुलासे के बाद जांच का दायरा और बढ़ गया है। अब एसओजी यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी डिग्रियां तैयार करने वाला नेटवर्क कितना बड़ा है और किन-किन लोगों ने इस पूरे खेल में भूमिका निभाई। यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला केवल एक अस्पताल संचालक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चिकित्सा क्षेत्र में फर्जी डिग्री और पंजीकरण के संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करेगा।
2024 में दर्ज हुई थी शिकायत, एसओजी ने की गिरफ्तारी
इस मामले की शुरुआत राजस्थान मेडिकल काउंसिल के तत्कालीन रजिस्ट्रार डॉ. गिरधर गोपाल की शिकायत से हुई थी। 6 अक्टूबर 2024 को जयपुर के अशोक नगर थाने में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कराने के मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। शुरुआत में आठ लोगों के नाम सामने आए थे। बाद में जांच के दौरान नानजीराम चौधरी के कथित फर्जी दस्तावेजों और पंजीकरण से जुड़े तथ्य भी सामने आए।
राजस्थान एसओजी ने अक्टूबर 2026 में कार्रवाई करते हुए नानजीराम चौधरी और पंकज यादव को गिरफ्तार किया। पंकज यादव पर भी फर्जी एमबीबीएस डिग्री और अंकसूचियों के आधार पर मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण कराने का आरोप है। दोनों आरोपियों से पूछताछ के आधार पर जांच एजेंसी अन्य संदिग्धों और दस्तावेज तैयार करने वालों की भूमिका की पड़ताल कर रही है।
अब मरीजों की सुरक्षा पर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले ने चिकित्सा व्यवस्था और मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि कोई व्यक्ति वास्तविक चिकित्सा शिक्षा और निर्धारित योग्यता के बिना फर्जी डिग्री के आधार पर डॉक्टर बनकर मरीजों का इलाज करता रहा, तो यह मरीजों की जान के साथ गंभीर खिलवाड़ है।
अब जांच एजेंसियों के सामने कई अहम सवाल हैं। आरोपी ने कितने मरीजों का इलाज किया? क्या उसने स्वयं ऑपरेशन भी किए? अस्पताल में कितने मरीजों का उपचार हुआ और क्या किसी मरीज को उसके कथित फर्जी चिकित्सकीय अनुभव के कारण नुकसान पहुंचा? अस्पताल में कार्यरत अन्य डॉक्टरों की योग्यता और पंजीकरण की स्थिति क्या थी?
एसओजी के अनुसार, सरकारी चिकित्सा योजनाओं का अस्पताल की ओर से अनुचित लाभ उठाए जाने की आशंका की भी जांच की जा रही है। इसके लिए जालोर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी से अस्पताल के दस्तावेज मांगे गए हैं। जिले के अन्य अस्पतालों के रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं।
डिग्री और पंजीकरण की जांच के बिना चिकित्सा व्यवस्था पर भरोसा कैसे?
रानीवाड़ा का यह मामला स्वास्थ्य विभाग, मेडिकल काउंसिल और अस्पतालों की निगरानी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। आखिर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों के आधार पर कोई व्यक्ति डॉक्टर के रूप में पंजीकरण कैसे हासिल कर सकता है? संबंधित संस्थानों से दस्तावेजों का सत्यापन किए बिना पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी कैसे हुई? यदि इसमें अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई जरूरी होगी।
फिलहाल एसओजी की जांच जारी है। इस मामले में सामने आए आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जांच के निष्कर्षों से होगी, लेकिन इस खुलासे ने चिकित्सा क्षेत्र में फर्जी डिग्री के सहारे सक्रिय लोगों की पहचान और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत को एक बार फिर सामने ला दिया है।
