बेटे की जिंदगी बचाने के लिए घंटों डॉक्टरों से गुहार लगाता रहा पिता, आखिरकार थम गई सांसें

शिवपुरी

 

शिवपुरी,

शरद केवट की मौत के बाद जिला अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर उठे गंभीर सवाल, परिजनों ने लगाया समय पर उपचार नहीं मिलने का आरोप

शिवपुरी(HRIDAY STAMBH);

सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावों के बीच शिवपुरी जिला चिकित्सालय से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था और मरीजों के प्रति जिम्मेदारी को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्राम पंचायत आसपुर निवासी एक पिता अपने बीमार बेटे की जिंदगी बचाने के लिए जिला अस्पताल में घंटों डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों से इलाज की गुहार लगाता रहा। आरोप है कि बेटे की गंभीर हालत के बावजूद उसे समय पर उचित उपचार नहीं मिल सका। आखिरकार पिता की आंखों के सामने ही उसके बेटे शरद केवट की मौत हो गई। इस घटना के बाद परिवार में मातम पसरा हुआ है, वहीं जिला अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, ग्राम आसपुर निवासी गुड्डा केवट का पुत्र शरद केवट पिछले करीब 10 से 15 दिनों से बीमार चल रहा था। बीमारी के चलते उसकी तबीयत लगातार खराब हो रही थी। परिजन उसे बेहतर उपचार की उम्मीद में शिवपुरी जिला चिकित्सालय लेकर पहुंचे थे। परिवार को उम्मीद थी कि सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में उसके बेटे को समय पर उपचार मिल जाएगा और उसकी जान बच सकेगी।
परिजनों का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद शरद की हालत ठीक नहीं थी। वह दर्द से परेशान था और उसे तत्काल चिकित्सकीय सहायता की जरूरत थी। पिता गुड्डा केवट अपने बेटे की तकलीफ देखकर डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों से बार-बार उपचार तथा आवश्यक जांच कराने की गुहार लगाता रहा। आरोप है कि इस दौरान परिवार को करीब तीन से चार घंटे तक परेशान होना पड़ा। पिता लगातार बेटे के इलाज के लिए प्रयास करता रहा, लेकिन उसे अपेक्षित चिकित्सकीय सहायता नहीं मिल सकी।
इस बीच शरद की हालत बिगड़ती चली गई और अंततः उसकी मौत हो गई। बेटे को बचाने के लिए अस्पताल में घंटों भटकने वाले पिता के लिए यह घटना जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बन गई। जिस उम्मीद के साथ वह अपने बेटे को अस्पताल लेकर पहुंचा था, वहां से उसे बेटे का शव लेकर लौटना पड़ा।

अस्पताल की व्यवस्थाओं पर उठे सवाल

इस घटना ने जिला चिकित्सालय की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि परिजनों के आरोप सही हैं, तो यह केवल एक मरीज को उपचार मिलने में हुई देरी का मामला नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है। अस्पताल में आने वाले मरीजों को उनकी बीमारी और गंभीरता के अनुसार तत्काल चिकित्सकीय सहायता मिलना आवश्यक है। विशेषकर गंभीर स्थिति में पहुंचे मरीजों के मामले में समय पर जांच, चिकित्सकीय परीक्षण और उपचार बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

तीन से चार घंटे तक क्यों भटकता रहा पिता?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शरद केवट को उपचार के लिए जिला अस्पताल लाया गया था, तब उसकी चिकित्सकीय स्थिति का तत्काल आकलन किया गया था या नहीं? क्या उसे इमरजेंसी में प्राथमिकता के आधार पर उपचार उपलब्ध कराया गया? परिजनों को जांच और उपचार के लिए कथित तौर पर तीन से चार घंटे तक इंतजार क्यों करना पड़ा? इस दौरान ड्यूटी पर कौन-कौन से चिकित्सक और स्वास्थ्य कर्मचारी मौजूद थे? क्या अस्पताल के रिकॉर्ड में मरीज के पहुंचने, जांच और उपचार से संबंधित पूरी जानकारी दर्ज है?
इन सभी बिंदुओं की जांच होना जरूरी है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

कलेक्टर से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग

घटना के बाद प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से मामले का संज्ञान लेने की मांग उठ रही है। मांग की जा रही है कि जिला अस्पताल में उपलब्ध चिकित्सकीय रिकॉर्ड, इमरजेंसी रजिस्टर, जांच रिपोर्ट और ड्यूटी पर तैनात चिकित्सकों एवं कर्मचारियों की जानकारी के आधार पर पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि शरद केवट को अस्पताल पहुंचने के बाद किस प्रकार का उपचार दिया गया और उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई। यदि जांच में चिकित्सकीय लापरवाही, उपचार में अनावश्यक देरी या ड्यूटी में गंभीर चूक सामने आती है, तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जान से जुड़ा है

शिवपुरी जिला चिकित्सालय जिले के हजारों लोगों के लिए उपचार का प्रमुख केंद्र है। ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मरीज यहां बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। ऐसे में अस्पताल की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि किसी भी मरीज को आवश्यक उपचार के लिए भटकना न पड़े।
शरद केवट की मौत से जुड़ा यह मामला स्वास्थ्य विभाग के सामने कई सवाल खड़े करता है। हालांकि, मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण और उपचार में किसी प्रकार की लापरवाही हुई या नहीं, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन एक परिवार की ओर से लगाए गए गंभीर आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाते हैं। क्या शरद केवट की मौत के पीछे की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच होगी या यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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