ग्वालियर,
ग्वालियर(HRIDAY STAMBH);
ग्वालियर जिले के ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व वाले बिलौआ स्थित सिद्धेश्वर मंदिर के आसपास फैले घने जंगलों पर लकड़ी माफियाओं का काला साया मंडरा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि पड़ोसी गाँव भटपुरा के लोग दिन-दिहाड़े और रात के अंधेरे में बेधड़क हरे-भरे पेड़ काट रहे हैं। इससे सिद्धेश्वर मंदिर और जौरासी क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन तेज़ी से खत्म होने की कगार पर पहुँच गया है।
सड़कों पर खड़ी लकड़ियों से भरी गाड़ियाँ, फिर भी ‘लाचार’ दिखता वन विभाग
स्थानीय लोगों के अनुसार, यदि कोई भी व्यक्ति भटपुरा गाँव के मुख्य मार्गों और सड़कों पर नज़र डाले, तो वहाँ अवैध रूप से काटी गई लकड़ियों से लदी बैलगाड़ियाँ और अन्य वाहन खुलेआम खड़े देखे जा सकते हैं।
हैरानी की बात यह है कि वनों की सुरक्षा का ज़िम्मा संभालने वाला फॉरेस्ट विभाग इन गाड़ियों को ज़ब्त करने या माफियाओं पर शिकंजा कसने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब मुख्य सड़कों पर लकड़ियों से भरी गाड़ियाँ खुलेआम खड़ी रहती हैं, तो वन विभाग के गश्ती दल को ये क्यों नज़र नहीं आतीं?
फॉरेस्ट विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल: क्या यह मिलीभगत है?
वन विभाग की इस रहस्यमयी खामोशी और निष्क्रियता के कारण क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएँ गर्म हैं। स्थानीय नागरिकों का सीधा आरोप है कि यह कटाई बिना विभागीय संरक्षण के संभव नहीं है।
- सांठगांठ का आरोप: ग्रामीणों का कहना है कि फॉरेस्ट अधिकारियों की शह और मिलीभगत से ही लकड़ी माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं।
- पर्यावरण को भारी नुकसान: बिलौआ और जौरासी के आसपास की प्राकृतिक पहाड़ियों व हरित आवरण को लगातार नुकसान पहुँचाया जा रहा है, जिससे क्षेत्रीय पर्यावरण पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है।
पर्यावरण प्रेमियों ने की उच्चस्तरीय जाँच की मांग
धार्मिक आस्था के केंद्र सिद्धेश्वर मंदिर परिसर के चारों ओर हो रहे इस विनाश से श्रद्धालुओं और पर्यावरणविदों में भारी रोष है। ग्रामीणों ने शासन और प्रशासन से निम्नलिखित माँगे की हैं:
- भटपुरा गाँव और आसपास के क्षेत्रों में तुरंत छापेमारी कर अवैध लकड़ी ज़ब्त की जाए।
- वन विभाग के लापरवाह और संदिग्ध अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक जाँच बैठाई जाए।
- बिलौआ और जौरासी के जंगलों की सुरक्षा के लिए विशेष गश्ती दल तैनात किया जाए ताकि इस प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सके।
अब देखना यह होगा कि मामला उजागर होने के बाद जिला प्रशासन और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी क्या कदम उठाते हैं, या फिर कागजी कार्यवाहियों के बीच सिद्धेश्वर मंदिर का यह जंगल यूँ ही सिमटता रहेगा।
