सीहोर (मध्य प्रदेश)। आमतौर पर पूरे देश में विजयादशमी के दिन एक ही बार रावण दहन कर उत्सव समाप्त हो जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा अंचल की परंपरा बिल्कुल हटकर और बेहद दिलचस्प है। यहां एक नहीं, बल्कि पूरे तीन दिन तक रावण दहन किया जाता है और पूरा इलाका उत्सव के रंग में सराबोर रहता है।
पिछले 150 साल से अधिक समय से चली आ रही इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए दूर-दूर से हजारों लोग आष्टा पहुंचते हैं।
क्यों शुरू हुई थी तीन दिन दशहरा मनाने की परंपरा?
इस अनोखी परंपरा के पीछे का कारण बेहद व्यावहारिक और सामाजिक था। जानकारों के मुताबिक, पुराने समय में मनोरंजन के साधन सीमित हुआ करते थे और त्योहार ही मेल-मिलाप व भाईचारे का मुख्य माध्यम थे।
यदि एक ही दिन रावण दहन रखा जाता, तो दूर-दराज के गांवों के लोग सभी कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाते। इसी समस्या को हल करने के लिए बुजुर्गों ने उत्सव का दायरा बढ़ाया और आष्टा, खड़ी हाट और कजलास—इन तीन जगहों को चुनकर लगातार तीन दिन तक दशहरा मनाने की नींव रखी। आज भले ही मनोरंजन के आधुनिक साधन आ गए हैं, लेकिन इस अंचल की आस्था और परंपरा आज भी कायम है।
तीन दिन, तीन जगह और अलग-अलग स्वरूप
आष्टा अंचल में यह महापर्व तीन अलग-अलग चरणों में मनाया जाता है:
- पहला दिन (विजयादशमी – आष्टा शहर): मुख्य आयोजन आष्टा शहर में होता है। यहां भव्य चल समारोह, राम-रावण युद्ध और आतिशबाजी के बीच 71 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया जाता है। बढ़ती भीड़ को देखते हुए अब इसे थाने के सामने नए दशहरा मैदान में आयोजित किया जाता है।
- दूसरा दिन (खड़ी हाट): विजयादशमी के अगले दिन खड़ी हाट में उत्सव मनाया जाता है। यहां गाजे-बाजे के साथ चल समारोह निकलता है और 25 फीट ऊंचे रावण का पुतला जलाया जाता है, जिसमें आसपास के 15 से अधिक गांवों के लोग शामिल होते हैं।
- तीसरा दिन (कजलास): इस तीन दिवसीय महापर्व का समापन तीसरे दिन कजलास में होता है। यहां रामलीला के अंतिम चरण के मंचन के बाद 20 से 25 फीट के रावण का दहन किया जाता है।
बदला स्वरूप, लेकिन उत्साह में कोई कमी नहीं
बुजुर्गों के अनुसार, पहले इस आयोजन की तैयारियां एक महीने पहले से शुरू हो जाती थीं, जिसमें ग्रामीण खुद पुतले बनाने और रामलीला की रिहर्सल में जुट जाते थे। हालांकि, आधुनिक दौर में अब तैयारियां 7 से 15 दिन में पूरी कर ली जाती हैं, लेकिन लोगों का उत्साह और उमंग आज भी पहले जैसा ही बना हुआ है।
इन तीन दिनों तक आष्टा, खड़ी हाट और कजलास में दीपावली जैसा माहौल रहता है और मेलों जैसी रौनक देखने को मिलती है। सीहोर का यह आष्टा अंचल साबित करता है कि समाज को जोड़ने वाली परंपराएं सदियों तक जीवित रहती हैं।
