दतिया।
दतिया(HRIDAY STAMBH):धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी दतिया का हृदय स्थल माना जाने वाला सीतासागर तालाब इन दिनों प्रशासनिक उपेक्षा, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की जीती-जागती तस्वीर बना हुआ है। तालाब को जलकुंभी और गंदगी से मुक्त कराने के नाम पर वर्ष 2022-23 में जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से लगभग 93 से 96 लाख रुपये खर्च कर चीन से एक अत्याधुनिक ‘वीड हार्वेस्टर’ मशीन मंगाई गई थी। बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि यह मशीन सीतासागर का कायाकल्प कर देगी, लेकिन आज हकीकत इसके ठीक उलट है—लाखों की यह मशीन तालाब किनारे जंग खा रही है और कबाड़ में तब्दील हो चुकी है।
सपनों का दावा और कड़वी हकीकत
मशीन की खरीद के समय नगर पालिका और तत्कालीन जिम्मेदारों ने यह दावा किया था कि चीन से आई इस तकनीक के जरिए सीतासागर को हमेशा के लिए जलकुंभी मुक्त कर दिया जाएगा। लेकिन कुछ ही समय के संचालन के बाद मशीन बंद होकर खड़ी हो गई। आज स्थिति यह है कि:पीपी
लापरवाही का मंजर: देखरेख के अभाव में मशीन में जंग लग चुकी है और उसके कलपुर्जे सड़ रहे हैं।
तालाब की स्थिति जस की तस: सीतासागर में जलकुंभी का जाल पहले से ज्यादा फैल चुका है, जिससे पानी दूषित हो रहा है और जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है।
दोहरा नुकसान: मशीन कबाड़ बनने के बाद तालाब की सफाई के नाम पर दोबारा नए सिरे से बजट ठिकाने लगाने का खेल शुरू हो गया है।
नगर पालिका और पार्षदों के गंभीर आरोप
हाल ही में नगर पालिका परिषद की बैठकों और सार्वजनिक मंचों पर स्थानीय पार्षदों ने इस मुद्दे को लेकर जमकर हंगामा किया। पार्षदों का सीधा आरोप है कि:
1. कमीशनखोरी का खेल: इतनी महंगी मशीन खरीदते समय उसकी मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और प्रशिक्षित ऑपरेटरों का कोई ध्यान नहीं रखा गया।
2. सफाई के नाम पर फालतू खर्च: मशीन के बंद पड़ने के बाद भी सफाई के नाम पर लगातार बजट पास किया जा रहा है, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।विधानसभा तक पहुंची गूंज
यह मामला अब सिर्फ दतिया तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि मध्य प्रदेश विधानसभा के पटल पर भी उठ चुका है। विपक्ष और जनप्रतिनिधियों द्वारा सीतासागर सहित राज्य के अन्य तालाबों की सफाई के नाम पर चीन निर्मित मशीनों की खरीद, टेंडर प्रक्रिया, कार्यादेश और भुगतान से संबंधित सभी दस्तावेजों की विस्तृत जानकारी मांगी गई है। विधानसभा में सवाल उठने से यह साफ हो गया है कि खरीद प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह है।
प्रशासनिक नाकामी पर बड़े सवाल
1. जवाबदेही किसकी? जब एक करोड़ रुपये के करीब जनधन खर्च किया गया, तो मशीन के मेंटेनेंस और संचालन की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई?
2. तकनीकी मूल्यांकन क्यों नहीं हुआ? चीनी मशीन खरीदने से पहले यह जांच क्यों नहीं की गई कि क्या स्थानीय परिस्थितियों में यह मशीन कारगर होगी और इसके स्पेयर पार्ट्स आसानी से उपलब्ध होंगे?
3. दोहरी मार क्यों? जब मशीन पहले से मौजूद है, तो उसकी मरम्मत कराने के बजाय दोबारा सफाई पर अतिरिक्त बजट क्यों फूंक जा रहा है?निष्कर्ष और निष्पक्ष जांच की मांग
सीतासागर की यह स्थिति प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी और योजनाओं के लचर क्रियान्वयन का एक स्पष्ट उदाहरण है। जनता का पैसा कागजी योजनाओं और कबाड़ बनती मशीनों की भेंट चढ़ गया है।
अब समय आ गया है कि इस पूरे मामले की—मशीन की खरीद के टेंडर से लेकर भुगतान और उसके बाद की उपेक्षा तक—एक उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। जो भी अधिकारी या जनप्रतिनिधि जनधन के इस दुरुपयोग और लापरवाही के जिम्मेदार हैं, उन पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि सीतासागर को उसका खोया हुआ सौंदर्य वापस मिल सके।

