क्या अमेरिका को मुस्तांग का ‘यूरेनियम भंडार’ सौंपने की तैयारी में है नेपाल?
काठमांडू | नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में दबे अरबों डॉलर के यूरेनियम भंडार और अमेरिकी विदेश राज्य मंत्री समीर पॉल कपूर के अचानक हुए नेपाल दौरे ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। दावों के मुताबिक, नेपाल सरकार चीन की सीमा से सटे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मुस्तांग क्षेत्र को एक ‘स्पेशल जोन’ घोषित करने और वहां यूरेनियम प्रोसेसिंग का अधिकार अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया को देने पर विचार कर रही है।
मुस्तांग स्पेशल जोन
सूत्रों के अनुसार, लो मन्थांग (अपर मुस्तांग) के 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को “मुस्तांग स्पेशल जोन” के रूप में विकसित करने की तैयारी है। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और पूर्व वित्त मंत्री रामेश्वर खनाल ने आधिकारिक तौर पर ऐसे किसी भी समझौते से इनकार किया है, लेकिन कुछ गोपनीय दस्तावेज अलग कहानी बयां कर रहे हैं।
क्यों खास है मुस्तांग का यूरेनियम?
नेपाल के खान एवं भूगर्भ विभाग ने 2014 में ही मुस्तांग में भारी मात्रा में यूरेनियम की पुष्टि की थी। इसके प्रमुख तकनीकी पहलू निम्नलिखित हैं लो मन्थांग में यह खदान लगभग 10 किमी लंबी और 3 किमी चौड़ी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यहाँ का यूरेनियम ‘मीडियम ग्रेड’ का है, जो परमाणु ऊर्जा और रणनीतिक हथियारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र नेपाल-चीन सीमा से मात्र 10 किलोमीटर दूर है, जिससे यह मुद्दा और भी संवेदनशील हो गया है।
अमेरिकी विदेश राज्य मंत्री समीर पॉल कपूर का वर्तमान दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक है। अमूमन अमेरिकी अधिकारी नेपाल के साथ बांग्लादेश या श्रीलंका का दौरा भी करते हैं, लेकिन इस बार कपूर का विशेष रूप से सिर्फ नेपाल आना इस ओर इशारा करता है कि वाशिंगटन के लिए काठमांडू अब सर्वोच्च प्राथमिकता पर है।
चीन और भारत की बढ़ी चिंताएं
नेपाल के पास वर्तमान में यूरेनियम निकालने की न तो तकनीक है और न ही पर्याप्त बजट। ऐसे में विदेशी मदद अनिवार्य है। लेकिन चीन और भारत, दोनों ही अपने ‘पड़ोस’ में अमेरिका जैसी महाशक्ति की मौजूदगी को लेकर आशंकित हैं। विशेषकर चीन के लिए, उसकी सीमा के इतने करीब अमेरिकी तकनीक और विशेषज्ञों का होना एक बड़ी सुरक्षा चुनौती हो सकता है। स्थानीय राजनीति में भी इस मुद्दे को लेकर उबाल है। चर्चा है कि काठमांडू के मेयर बालेन शाह और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं पर इस अंतरराष्ट्रीय दबाव का क्या असर होगा। क्या नेपाल अपनी ‘गुटनिरपेक्षता’ की नीति को कायम रख पाएगा या आर्थिक संकट और तकनीक की कमी उसे किसी एक पाले में जाने को मजबूर कर देगी । फिलहाल, सरकार ने किसी भी आधिकारिक अनुबंध की पुष्टि नहीं की है, लेकिन ‘मुस्तांग स्पेशल जोन’ की सुगबुगाहट ने हिमालयी कूटनीति में ‘ग्रेट गेम’ की वापसी के संकेत दे दिए हैं।

