नई दिल्ली,
नई दिल्ली(HRIDAY STAMBH);
हायर एजुकेशन और वैश्विक प्रतिभा पलायन (Global Talent Migration) को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। स्टडीपोर्टल (Studyportals) और कैम्ब्रिज आईELTS (Cambridge IELTS) द्वारा संयुक्त रूप से जारी की गई ‘टैलेंट बियॉन्ड बॉर्डर्स’ (Talent Beyond Borders) नामक अध्ययन में भारतीय युवाओं के विदेश में बसने और ‘ब्रेन ड्रेन’ को लेकर अहम आंकड़े उजागर हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले 63 प्रतिशत भारतीय छात्रों ने खुद को ‘स्टेयर्स’ (Stayers) यानी वहीं ठहरने वाला बताया है। इससे साफ जाहिर होता है कि भारतीय छात्र केवल डिग्री के लिए विदेश नहीं जा रहे, बल्कि उनका मुख्य लक्ष्य पढ़ाई के बाद उसी देश में स्थायी रूप से बसना और करियर बनाना है।
वहीं दूसरी ओर, भारत में आकर पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों की स्थिति इसके ठीक उलट है। भारत से स्नातक या उच्च शिक्षा पूरी करने वाले 47 फीसदी विदेशी छात्र वापस अपने गृह देश लौट जाते हैं। यह विरोधाभास भारत के टैलेंट इकोसिस्टम, हायर एजुकेशन पॉलिसी और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार की नई जमीनी हकीकत को बयां करता है।
भारतीय छात्रों के विदेश में बसने के मुख्य कारण
रिपोर्ट और शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय युवाओं के विदेश जाकर स्थायी रूप से सेटल होने के पीछे कई आर्थिक, सामाजिक और नीतिगत कारक जिम्मेदार हैं:
- उच्च जीवन स्तर और सामाजिक सुरक्षा: विकसित देशों में मिलने वाली बेहतर लाइफस्टाइल, सामाजिक सुरक्षा, प्रदूषण मुक्त माहौल और पारदर्शी कार्य संस्कृति युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रही है।
- आकर्षक वेतन और करियर ग्रोथ: भारत की तुलना में विकसित देशों के जॉब मार्केट में शुरुआती सैलरी पैकेज और करियर ग्रोथ के अवसर काफी अधिक होते हैं।
- लचीली पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा नीतियां: अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों द्वारा दी जाने वाली पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा नीतियां और पीआर (Permanent Residency) के आसान रास्ते छात्रों की राह सुगम बनाते हैं।
- बढ़ती आर्थिक क्षमता: भारत में मजबूत होते मध्यम वर्ग की आर्थिक क्षमता बढ़ी है, जिससे परिवार एजुकेशन लोन या बचत के दम पर विदेशी शिक्षा में आसानी से निवेश कर पा रहे हैं।
नीतिगत व सामाजिक-राजनीतिक माहौल का प्रभाव
इस ग्लोबल टैलेंट मूवमेंट पर मौजूदा सरकारी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक समझौतों का भी सीधा प्रभाव दिख रहा है:
- द्विपक्षीय करार और ग्लोबल मोबिलिटी: भारत सरकार द्वारा प्रमुख विकसित देशों के साथ किए गए शैक्षणिक और श्रम समझौतों ने भारतीय छात्रों के लिए विदेशों में पढ़ाई और रोजगार के अवसर सुलभ बनाए हैं।
- अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और विशाल युवा आबादी: देश में विशाल युवा आबादी और डोमेस्टिक जॉब मार्केट में बढ़ती कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण कई मेधावी युवा विदेश में बेहतर अवसरों की तलाश को अधिक व्यावहारिक मानते हैं।
- ‘स्टडी इन इंडिया’ का प्रभाव: भारत सरकार के ‘स्टडी इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत आने वाले अधिकांश छात्र दक्षिण एशियाई, अफ्रीकी व विकासशील देशों से होते हैं। ये छात्र भारत में किफायती शिक्षा पूरी कर अपने देशों में योगदान देने के उद्देश्य से वापस लौटना पसंद करते हैं।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने? (ब्रेन ड्रेन बनाम आर्थिक योगदान)
यह अध्ययन भारत के सामने ‘ब्रेन ड्रेन’ (Brain Drain) यानी मेधा के पलायन की चुनौती को एक बार फिर रेखांकित करता है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश भारत से अगर योग्य और प्रतिभावान छात्र स्थायी रूप से विदेश चले जाएंगे, तो इससे देश के घरेलू नवाचार और आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है।
हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि विदेशों में बसा मजबूत भारतीय समुदाय (Indian Diaspora) देश में विदेशी मुद्रा (Remittances) भेजने, कूटनीतिक सॉफ्ट पावर बढ़ाने और भारत को वैश्विक पटल पर मजबूती देने में अहम भूमिका निभाता है।
निष्कर्ष
’टैलेंट बियॉन्ड बॉर्डर्स’ रिपोर्ट यह साबित करती है कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा अब केवल ज्ञान या डिग्री हासिल करने का जरिया नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्लोबल करियर और स्थायी बेहतर जीवनशैली हासिल करने का सबसे बड़ा माध्यम बन चुकी है।


