नई दिल्ली,
नई दिल्ली(HRIDAY STAMBH);
भारतीय रेलवे आधुनिक सुविधाओं और तेज रफ्तार ट्रेनों के विस्तार पर लगातार जोर दे रहा है। इसी कड़ी में देश के अलग-अलग रेल मार्गों पर वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों का संचालन शुरू किया जा रहा है। सरकार और रेलवे इसे आधुनिक रेल व्यवस्था की दिशा में बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं। हालांकि, अब कुछ रूटों पर इन ट्रेनों की उपयोगिता और यात्रियों की वास्तविक मांग को लेकर सवाल उठने लगे हैं। ताजा मामला बनारस-खजुराहो वंदे भारत एक्सप्रेस का है, जहां ट्रेन में रोजाना 300 से अधिक सीटें खाली रहने का दावा किया जा रहा है।
इस स्थिति ने रेलवे की ट्रेन संचालन योजना और रूट चयन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि आखिर किसी भी रेल मार्ग पर नई प्रीमियम ट्रेन शुरू करने से पहले यात्रियों की संख्या, उनकी यात्रा की जरूरत, किराया वहन करने की क्षमता और उस रूट पर पहले से उपलब्ध रेल सेवाओं का पर्याप्त आकलन किया जाता है या नहीं?
रोजाना 300 से अधिक सीटें खाली रहने का दावा
बनारस-खजुराहो वंदे भारत एक्सप्रेस को लेकर सोशल मीडिया पर सामने आई टिप्पणी में दावा किया गया है कि इस ट्रेन में प्रतिदिन 300 से ज्यादा सीटें खाली चल रही हैं। यदि यह आंकड़ा नियमित रूप से सही साबित होता है, तो यह रेलवे के लिए निश्चित रूप से समीक्षा का विषय है।
वंदे भारत जैसी प्रीमियम श्रेणी की ट्रेन में आधुनिक सुविधाएं, बेहतर इंटीरियर, आरामदायक सीटें और अपेक्षाकृत तेज यात्रा का विकल्प उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन इन सुविधाओं का वास्तविक लाभ तभी है, जब संबंधित रूट पर पर्याप्त संख्या में यात्री इस ट्रेन का इस्तेमाल करें।
सवाल यह भी है कि यदि किसी ट्रेन में बड़ी संख्या में सीटें खाली रह रही हैं, तो क्या इसका कारण यात्रियों की कम मांग है, किराया अधिक होना है, समय-सारिणी अनुकूल नहीं होना है या फिर ट्रेन का रूट यात्रियों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप नहीं है?
वंदे भारत चलाने से पहले क्यों नहीं होता जरूरत का आकलन?
रेलवे के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि नई ट्रेन शुरू करने से पहले संबंधित रूट का व्यापक अध्ययन कितना किया जाता है। किसी भी ट्रेन का संचालन केवल दो शहरों को जोड़ने के आधार पर तय नहीं होना चाहिए।
इसके लिए कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करना जरूरी है। इनमें प्रमुख हैं—
संबंधित रूट पर प्रतिदिन यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या।
पहले से संचालित ट्रेनों में उपलब्ध सीटों और उनकी ऑक्यूपेंसी की स्थिति।
यात्रियों की आर्थिक क्षमता और प्रस्तावित ट्रेन का किराया।
ट्रेन के समय और यात्रियों की यात्रा संबंधी जरूरतों के बीच तालमेल।
बीच के प्रमुख स्टेशनों से मिलने वाली यात्री मांग।
उस रूट पर ट्रेन के संचालन से होने वाली संभावित आय और खर्च।
यदि इन पहलुओं का सही तरीके से आकलन किया जाए, तो रेलवे ऐसी सेवाएं शुरू कर सकता है जिनसे यात्रियों को वास्तविक सुविधा मिले और रेलवे को भी आर्थिक लाभ हो।
आधुनिक ट्रेन जरूरी, लेकिन हर रूट पर नहीं!
यहां सवाल वंदे भारत एक्सप्रेस के संचालन का विरोध करने का नहीं है। निश्चित रूप से देश को आधुनिक, तेज और बेहतर सुविधाओं वाली ट्रेनों की जरूरत है। वंदे भारत जैसी ट्रेनें भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लेकिन आधुनिक ट्रेन होने का अर्थ यह नहीं है कि उसे हर रूट पर शुरू कर दिया जाए। किसी भी ट्रेन की सफलता उसकी तकनीक और बाहरी चमक से नहीं, बल्कि यात्रियों की उपयोगिता, समय की बचत, नियमित मांग और आर्थिक व्यवहार्यता से तय होती है।
यदि किसी मार्ग पर यात्रियों को सामान्य एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेन से ही बेहतर सुविधा मिल रही है और महंगे किराये वाली प्रीमियम ट्रेन में पर्याप्त यात्री नहीं मिल रहे हैं, तो रेलवे को इस स्थिति का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए।
खाली सीटों से रेलवे की कमाई पर भी असर
ट्रेन में सीटें खाली रहने का सीधा मतलब है कि उपलब्ध यात्री क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। हालांकि, खाली सीटों की संख्या को सीधे रेलवे के नुकसान के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि ट्रेन के संचालन में कई तरह के खर्च और आय के स्रोत शामिल होते हैं।
इसके बावजूद लगातार कम यात्री मिलने पर ट्रेन की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित हो सकती है। ट्रेन के संचालन में ईंधन या बिजली, रखरखाव, कर्मचारियों, परिचालन और अन्य मदों पर खर्च होता है। ऐसे में यदि यात्री संख्या अपेक्षा से काफी कम रहती है, तो रेलवे के लिए उस सेवा की समीक्षा करना जरूरी हो जाता है।
रेलवे से उठ रहे हैं ये अहम सवाल
बनारस-खजुराहो वंदे भारत एक्सप्रेस को लेकर उठे सवाल रेलवे की योजना और प्राथमिकताओं पर व्यापक बहस की जरूरत बताते हैं।
रेलवे को स्पष्ट करना चाहिए कि इस ट्रेन की निर्धारित यात्री क्षमता कितनी है और वास्तविक औसत ऑक्यूपेंसी क्या है? क्या रोजाना 300 से अधिक सीटें खाली रहने का दावा सही है? यदि हां, तो इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या ट्रेन शुरू करने से पहले यात्री मांग का पर्याप्त सर्वे कराया गया था?
इसके साथ ही रेलवे को यह भी देखना चाहिए कि जिन रूटों पर यात्रियों को आज भी नियमित ट्रेनों में कन्फर्म टिकट नहीं मिलते, वहां नई ट्रेनों की जरूरत को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती?
भारतीय रेलवे देश की करोड़ों आबादी की जीवनरेखा है। आम यात्रियों के लिए समय पर ट्रेन मिलना, किफायती किराया, कन्फर्म टिकट और सुविधाजनक यात्रा आज भी बड़ी जरूरतें हैं।
ऐसे में रेलवे की प्राथमिकता केवल नई ट्रेनों की शुरुआत और उनके उद्घाटन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जरूरी है कि प्रत्येक ट्रेन को शुरू करने से पहले यात्रियों की वास्तविक मांग का आकलन हो और संचालन के बाद भी उसकी नियमित समीक्षा की जाए।
आखिरकार सवाल सीधा है—रेलवे ट्रेनें यात्रियों की सुविधा के लिए चला रहा है या केवल नई ट्रेनों की संख्या बढ़ाने के लिए? वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों का विस्तार स्वागतयोग्य है, लेकिन इनका संचालन जरूरत, मांग और आर्थिक व्यवहार्यता के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी रूट पर यात्रियों की पर्याप्त संख्या नहीं है, तो रेलवे को समय रहते अपनी रणनीति में बदलाव करना चाहिए।
