​आईआईटी इंदौर में 4 साल में 45% बढ़े छात्र; ड्रॉपआउट रोकने पर जोर

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इंदौर / भोपाल:

इंदौर(HRIDAY STAMBH);देश के प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में जहां एक ओर पढ़ाई बीच में छोड़ने (ड्रॉपआउट) के आंकड़े चिंता बढ़ा रहे हैं, वहीं आईआईटी इंदौर से एक सकारात्मक और राहत देने वाली तस्वीर सामने आई है। नेशनल टास्क फोर्स (NTF) की अंतरिम रिपोर्ट और संस्थान के आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में आईआईटी इंदौर में विद्यार्थियों की संख्या में 45 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। हालांकि, संस्थान प्रशासन का मानना है कि केवल छात्र संख्या बढ़ना ही काफी नहीं है, बल्कि ड्रॉपआउट रोकने के लिए परिसर की व्यवस्थाओं को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

​4 साल में बढ़े 1,052 विद्यार्थी

​आईआईटी इंदौर में शैक्षणिक सत्र 2022-23 की तुलना में 2025-26 तक विद्यार्थियों के आधार में भारी वृद्धि दर्ज की गई है:

  • ​2022-23: 2,333 विद्यार्थी
  • ​2023-24: 2,810 विद्यार्थी
  • ​2024-25: 3,140 विद्यार्थी
  • ​2025-26: 3,385 विद्यार्थी

​इन चार वर्षों में कुल 1,052 विद्यार्थियों (45%) की बढ़ोतरी हुई है। आईआईटी इंदौर के पीआरओ प्रो. सुनील कुमार के अनुसार, यह वृद्धि संस्थान के निरंतर विस्तार और अकादमिक साख को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि संस्थान का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी विद्यार्थी को परिस्थितियों के कारण पढ़ाई बीच में न छोड़नी पड़े।

​राष्ट्रीय स्तर पर आरक्षित वर्गों का ड्रॉपआउट चिंताजनक

​एक तरफ जहां इंदौर में छात्रों का आंकड़ा बढ़ा है, वहीं एनटीएफ की रिपोर्ट के अनुसार साल 2018 से 2023 के बीच देश भर के आईआईटी परिसरों से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के कुल 3,542 विद्यार्थियों ने पढ़ाई बीच में छोड़ी।

​यदि आईआईटी इंदौर के पुराने संसदीय रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो वहां कुल 50 ड्रॉपआउट दर्ज किए गए थे (जिसमें 6 SC, 3 ST, 8 OBC और 33 अन्य श्रेणियों के छात्र शामिल थे)। सरकार के अनुसार, ड्रॉपआउट के प्रमुख कारणों में दूसरे बेहतर संस्थानों में प्रवेश मिलना, व्यक्तिगत वजहें और विपरीत परिस्थितियां शामिल हैं।

​मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत

​एनटीएफ के राष्ट्रव्यापी सर्वे में यह चिंताजनक बात सामने आई है कि 70% से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों में फुल-टाइम काउंसलर मौजूद नहीं थे, और 4% से भी कम संस्थानों के पास सुसाइड रिस्क मैनेजमेंट प्रोटोकॉल था।

​विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती छात्र संख्या के साथ-साथ आईआईटी इंदौर जैसे तेजी से विकसित हो रहे परिसरों में छात्रों के मानसिक तनाव को दूर करने, वित्तीय सहायता देने और काउंसलिंग व्यवस्थाओं को और अधिक मजबूत करने की सख्त आवश्यकता है।

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