झारखंड की कविता महतो ने होम गार्ड भर्ती में रचा इतिहास, 6 मिनट में तय किया 1600 मीटर सफर

देश विदेश

 

रामगढ़,

रामगढ़ (HRIDAY STAMBH);

“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…” इन पंक्तियों को झारखंड के रामगढ़ जिले की कविता महतो ने सच कर दिखाया है। सिर से पति का साया उठने के बाद, दो बच्चों और बुजुर्ग सास-ससुर की जिम्मेदारी संभाल रही कविता ने गरीबी, तंगहाली और विपरीत परिस्थितियों को मात देकर होम गार्ड बनने का सपना साकार करने की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाया है।

​भूखे पेट, साड़ी पहनकर मैदान में उतरीं ‘शेरनी’

होम गार्ड की शारीरिक दक्षता परीक्षा वाले दिन मैदान पर जब बाकी अभ्यर्थी स्पोर्ट्स शूज़ और ट्रैक सूट में नजर आ रहे थे, तब कविता महतो भूखे पेट, साड़ी पहनकर नंगे पांव कंक्रीट और कंकड़-पत्थरों से भरे मैदान में उतरीं। उनके पास न तो दौड़ने के लिए जूते थे और न ही हौसला बढ़ाने के लिए मैदान पर कोई अपना मौजूद था।

​10 मिनट का लक्ष्य, महज 6 मिनट में फतह

आयोजकों ने 1600 मीटर की दौड़ पूरी करने के लिए 10 मिनट का समय निर्धारित किया था। लेकिन साड़ी का पल्लू कसकर जब कविता दौड़ पड़ीं, तो उनकी रफ्तार के आगे हर रुकावट छोटी पड़ गई। उन्होंने महज 6 मिनट के आसपास इस कठिन दौड़ को पूरा कर मैदान में मौजूद हर अधिकारी और दर्शक को भावुक कर दिया।

​पति के जाने के बाद टूटी नहीं, बनीं परिवार का ढाल

पति के असमय निधन के बाद कविता के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। घर की माली हालत बेहद खराब है। उनके बुजुर्ग ससुर खेतों में थोड़ी-बहुत खेती कर परिवार का पेट पालने का प्रयास करते हैं, जिसमें कविता घर के काम निपटाकर उनका हाथ बटाती हैं। अपने दो नन्हे बच्चों के बेहतर भविष्य और परिवार को गरीबी के दलदल से निकालने के लिए कविता रोजाना सुबह 4 बजे उठकर दौड़ने का अभ्यास करती थीं।

​सलाम कविता के अटूट जज्बे को

फिनिशिंग लाइन पार करते ही कविता महतो की यह संघर्षगाथा पूरे प्रदेश और देश में प्रेरणा का स्रोत बन गई। एक माँ और बहू के रूप में उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादों में मजबूती और अपनों का सपना आंखों में हो, तो अभावों का कोई भी पहाड़ आपके कदमों को रोक नहीं सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *