सियासी बिसात पर ‘नारी शक्ति’ को साधने की होड़
नई दिल्ली/कोलकाता: लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करने वाले संविधान संशोधन विधेयक का पारित न हो पाना अब पश्चिम बंगाल के चुनावी अखाड़े में एक बड़ा मुद्दा बनता दिख रहा है। 2029 से लागू होने वाले इस विधेयक को लेकर मचे घमासान के बीच, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल के आगामी चुनावों में ‘महिला वोटर’ ही हार-जीत की असली सूत्रधार बनेंगी।
बीजेपी इस मुद्दे को विपक्ष, विशेषकर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी की ‘विफलता’ और ‘अवरोधक नीति’ के रूप में पेश कर रही है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इसे केंद्र सरकार की एक ‘चुनावी साजिश’ करार दिया है। टीएमसी का तर्क है कि बीजेपी केवल श्रेय लेने की राजनीति कर रही है, जबकि जमीनी स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने में उसकी मंशा साफ नहीं है। बंगाल की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, बंगाल में महिला मतदाता पारंपरिक रूप से साइलेंट और निर्णायक रही हैं।
महिला आरक्षण एक संवेदनशील और दूरगामी मुद्दा है। बीजेपी इसके जरिए टीएमसी के महिला वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में है, वहीं ममता बनर्जी अपनी ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं और महिला प्रतिनिधित्व के अपने पुराने ट्रैक रिकॉर्ड के जरिए पलटवार कर सकती हैं हालांकि यह मुद्दा हवा में तैर रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इसका वास्तविक चुनावी प्रभाव कितना होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
बंगाल में महिला मतदाताओं का प्रतिशत काफी अधिक है और वे अक्सर स्वतंत्र रूप से मतदान करती हैं। क्या दिल्ली का ‘आरक्षण बिल’ बंगाल के ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की प्राथमिकता बनेगा? यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, दोनों ही पार्टियां खुद को महिलाओं का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुट गई हैं। महिला आरक्षण विधेयक का पारित न होना सिर्फ एक विधायी घटना नहीं, बल्कि बंगाल चुनाव के लिए एक धारदार सियासी हथियार बन गया है।

