श्योपुर
कहीं सिगड़ी तो जल रही भट्टी, स्वाद में भी आया अंतर
श्योपुर। कोयले की सिगड़ी में बनती चाय, तो वहीं लकड़ी की भट्टी में बन रहे समोसे-कचोरी उन पुराने दिनो की याद दिलाते हैं जब लोग टपरियों में बैठकर आपसी संवाद के रिश्ते मजबूत करते थे और सिलेंडर का चलन बेहद कम था और रिश्तो में प्रेम की मिठास घुला करती थी, लेकिन वर्तमान के आधुनिक युग में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और समय की कमी के चलते सिलेंडर का चलन बेहद तेज गति से होने लगा, ऐसे में ईरान पर इजरायल और अमेरिका द्वारा युद्ध की शुरूआत के बाद समय में बदलाव आ गया और पेट्रोलियम पदार्थों के साथ एलपीजी सिलेंडरो की कमी तेजी से आने लगी। अब शहर में सिगड़ी में डलते कोयले पर बनी चाय और भट्टी पर बने समोसे कचोरी खूब बन रहे हैं, जिसके स्वाद में भी अंतर आया है, हां लेकिन बनने के बदले तरीको के बाद रेट में भी बढ़ोत्तरी हो गई है। इस दौरान होटलो में भी एलपीजी सिलेंडर की जगह लकड़ी, कोयले और डीजल भट्टी की चलन शुरू हो गया है, जहां सब्जियों की वेरायटी लगभग आधी हो गई है तो वहीं सब्जियों के दामो में भी तेजी नजर आ रही है। इस स्थिति के बाद शहर में हर जगह चर्चा आम हो गई है कि भारत में एलपीजी संकट कब खत्म होगा।
बाक्स
होटल पर सब्जी, बाजार में समोसे-कचोरी महंगे
एलपीजी संकट के बीच शहर में हालात काफी बदले बदले से नजर आ रहे हैं, जहां होटलो पर सब्जियां महंगी हो गई है तो वहीं बाजार में समोसे-कचोरी के दामो में भी 50 फीसदी तक बढोत्तरी हो गई है, जिसका असर आम आदमी की जेबो पर पड़ रहा हैं, जिसका कारण व्यावसायिक सिलेंडरो पर प्रतिबंध हैं। इसके अलावा होटल पर सब्जियों की वेराटियां भी लगभग खत्म हो गई है, जहां केवल दाल, आलू-छोले जैसी कम ईंधन में पकने वाली सब्जियां ही परोसी जा रही है।
श्योपुर। कोयले की सिगड़ी में बनती चाय, तो वहीं लकड़ी की भट्टी में बन रहे समोसे-कचोरी उन पुराने दिनो की याद दिलाते हैं जब लोग टपरियों में बैठकर आपसी संवाद के रिश्ते मजबूत करते थे और सिलेंडर का चलन बेहद कम था और रिश्तो में प्रेम की मिठास घुला करती थी, लेकिन वर्तमान के आधुनिक युग में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और समय की कमी के चलते सिलेंडर का चलन बेहद तेज गति से होने लगा, ऐसे में ईरान पर इजरायल और अमेरिका द्वारा युद्ध की शुरूआत के बाद समय में बदलाव आ गया और पेट्रोलियम पदार्थों के साथ एलपीजी सिलेंडरो की कमी तेजी से आने लगी। अब शहर में सिगड़ी में डलते कोयले पर बनी चाय और भट्टी पर बने समोसे कचोरी खूब बन रहे हैं, जिसके स्वाद में भी अंतर आया है, हां लेकिन बनने के बदले तरीको के बाद रेट में भी बढ़ोत्तरी हो गई है। इस दौरान होटलो में भी एलपीजी सिलेंडर की जगह लकड़ी, कोयले और डीजल भट्टी की चलन शुरू हो गया है, जहां सब्जियों की वेरायटी लगभग आधी हो गई है तो वहीं सब्जियों के दामो में भी तेजी नजर आ रही है। इस स्थिति के बाद शहर में हर जगह चर्चा आम हो गई है कि भारत में एलपीजी संकट कब खत्म होगा।
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होटल पर सब्जी, बाजार में समोसे-कचोरी महंगे
एलपीजी संकट के बीच शहर में हालात काफी बदले बदले से नजर आ रहे हैं, जहां होटलो पर सब्जियां महंगी हो गई है तो वहीं बाजार में समोसे-कचोरी के दामो में भी 50 फीसदी तक बढोत्तरी हो गई है, जिसका असर आम आदमी की जेबो पर पड़ रहा हैं, जिसका कारण व्यावसायिक सिलेंडरो पर प्रतिबंध हैं। इसके अलावा होटल पर सब्जियों की वेराटियां भी लगभग खत्म हो गई है, जहां केवल दाल, आलू-छोले जैसी कम ईंधन में पकने वाली सब्जियां ही परोसी जा रही है।

