दिल्ली में ‘वोट युद्ध’: एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के मुद्दे पर सड़क से मैदान तक आर-पार,

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नई दिल्ली,

नई दिल्ली(HRIDAY STAMBH);

देश की सियासत का केंद्र बनी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस वक्त राजनीतिक हलचल अपने चरम पर पहुंच चुकी है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर जारी घमासान ने अब एक बड़े राजनीतिक संग्राम का रूप ले लिया है। एक तरफ जहां पूरा विपक्ष चुनाव आयोग की साख और कार्यप्रणाली पर हमलावर है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे पर रक्षात्मक रवैया छोड़कर आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। 1 नवंबर को ऐतिहासिक रामलीला मैदान में होने वाली विपक्षी गठबंधन की महारैली से ठीक पहले बीजेपी ने दिल्ली के दिल चांदनी चौक से अपना सबसे बड़ा जनसंपर्क और शक्ति प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

चांदनी चौक से हुंकार: ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’

बुधवार को चांदनी चौक के ऐतिहासक और व्यस्ततम मार्गों पर उस समय अचानक सियासी गर्माहट बढ़ गई, जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अगुवाई में पार्टी का विशाल जुलूस सड़क पर उतरा। इस पदयात्रा में पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा। अनुमान जताया जा रहा है कि इस जनसंपर्क में करीब 15 हजार से भी ज्यादा लोग शामिल हुए, जिससे पुरानी दिल्ली के सड़कें पूरी तरह से बीजेपी के झंडों और नारों से पट गईं। नितिन नवीन के साथ इस पदयात्रा में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, केंद्रीय मंत्री व पार्टी के वरिष्ठ नेता हर्ष मल्होत्रा, स्थानीय सांसद और प्रदेश स्तर के तमाम दिग्गज पदाधिकारी एक ही मंच पर नजर आए।

बीजेपी ने इस पूरे अभियान को ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ का नाम देकर एक बड़ा नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की है। माना जा रहा है कि इस विशाल पदयात्रा के जरिए बीजेपी सीधे जनता के बीच पहुंचकर यह संदेश देना चाहती है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक संवैधानिक और पूरी तरह से पारदर्शी प्रक्रिया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि विपक्ष जिस तरह से एसआईआर को लेकर जनता के मन में संदेह पैदा कर रहा है, उसका जवाब सीधे जनता के बीच जाकर ही दिया जा सकता है। इसी सोच के तहत पार्टी ने चांदनी चौक जैसे घनी आबादी और व्यापारिक केंद्र को अपने इस बड़े अभियान की शुरुआत के लिए चुना।

विवाद की जड़: SIR, चुनाव आयोग और ‘वोट चोरी’ का आरोप

इस समूचे विवाद की जड़ में वह मीडिया रिपोर्ट है जिसने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। उस खुलासे के बाद से ही विपक्षी खेमे ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाने पर ले रखा है। कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों का आरोप है कि एसआईआर की आड़ में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की जा रही है और चुन-चुनकर एक खास वर्ग के वैध मतदाताओं के नाम सूची से गायब किए जा रहे हैं। विपक्ष इसे महज एक तकनीकी प्रक्रिया न मानकर ‘वोट चोरी’ का एक बड़ा षड्यंत्र बता रहा है और यही वजह है कि उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के तुरंत इस्तीफे की मांग पर पूरा जोर लगा दिया है।

हालाँकि इस पूरे मामले पर खुद चुनाव आयोग और सत्ताधारी दल ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। चुनाव आयोग ने हर स्तर पर निष्पक्षता का दावा करते हुए स्पष्ट किया है कि एसआईआर से जुड़ा हर निर्णय नियमों के तहत और सर्वसम्मति से लिया गया है, ताकि मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिरहित बनाया जा सके। वहीं बीजेपी के नेताओं का आरोप है कि जब भी चुनाव नजदीक आते हैं या विपक्ष को अपनी हार का अंदेशा होता है, वे चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ उछालना शुरू कर देते हैं। बीजेपी का दावा है कि फर्जी वोटरों को हटाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए बेहद जरूरी है और विपक्ष इसी सफाई अभियान से घबरा रहा है।

1 नवंबर को रामलीला मैदान में INDIA गठबंधन का ‘शक्ति प्रदर्शन’

सड़क पर छिड़ी इस जंग का अगला और सबसे बड़ा पड़ाव 1 नवंबर को आने वाला है, जब दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान ‘इंडिया’ गठबंधन की महारैली का गवाह बनेगा। विपक्षी खेमा इस रैली को अपने शक्ति प्रदर्शन का सबसे बड़ा जरिया बनाने में जुटा है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने दिल्ली समेत पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश से भारी भीड़ जुटाने की तैयारी की है। विभिन्न छात्र संगठनों, ट्रेड यूनियनों और सामाजिक संस्थाओं को इस महारैली को सफल बनाने के लिए मोर्चे पर लगा दिया गया है।

कुल मिलाकर, आने वाले कुछ दिन राजधानी दिल्ली की भावी राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित होंगे। एक तरफ जहां बीजेपी चांदनी चौक की सड़कों पर पसीना बहाकर अपने कार्यकर्ताओं में नया जोश भर रही है और विपक्ष के दावों की हवा निकालने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल 1 नवंबर को रामलीला मैदान से सीधे केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को ललकारने की रणनीति बना रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष की इस आमने-सामने की लड़ाई ने दिल्ली के राजनीतिक पारे को नवंबर की शुरुआत से पहले ही उबाल पर पहुंचा दिया है।

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