नई दिल्ली
नई दिल्ली(HRIDAY STAMBH);
लोकतंत्र में विरोध के स्वर को दबाने की कोशिशों के खिलाफ अब छात्र और युवा सड़कों से लेकर अदालतों तक मुखर होने लगे हैं। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा ‘पीस बॉन्ड’ (शांति मुचलका) पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार करने के बाद देश के छात्र समुदाय और वामपंथी संगठनों में जबरदस्त आक्रोश फैल गया है। नेहा बोरा का यह कदम न केवल उनके व्यक्तिगत प्रतिरोध को दर्शाता है, बल्कि यह तानाशाही रवैये और असहमति की आवाज़ों को कुचलने की प्रशासनिक कार्रवाइयों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
क्या है पूरा मामला और क्यों मचा है बवाल?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किया गया था। इस प्रदर्शन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाली नेहा बोरा को दिल्ली पुलिस ने 16 अक्टूबर को हिरासत में लिया और अगले दिन यानी 17 अक्टूबर को रिहा कर दिया गया।
रिहाई के तुरंत बाद, नई दिल्ली जिले की विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) अदालत ने नेहा बोरा को एक तुगलकी नोटिस थमा दिया। इस नोटिस के तहत उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर 10,000 रुपये का निजी मुचलका भरने और एक जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया—यह तर्क देते हुए कि यह ‘शांति भंग होने की आशंका’ को रोकने के लिए निवारक कार्रवाई है।
नेहा बोरा का दो टूक जवाब: “ना हम झुकेंगे, ना साइन करेंगे!”
अदालत और पुलिस के इस दबाव के आगे झुकने से साफ इंकार करते हुए नेहा बोरा ने दहाड़ते हुए कहा कि न तो वह और न ही आइसा का कोई भी सदस्य इस दमनकारी पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करेगा।
उन्होंने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया:
“मैंने पीस बॉन्ड पर इसलिए साइन नहीं किए, क्योंकि यह सीधे तौर पर मेरे और हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों को छीन रहा है। देश में कहीं भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने वाले लोगों को रोकने के लिए इस तरह के हथकंडों का इस्तेमाल किया जा रहा है।”
न्याय की आस और दिल्ली हाईकोर्ट का निराशाजनक रुख
अपने मौलिक अधिकारों के हनन के खिलाफ लड़ते हुए, AISA अध्यक्ष ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि:
SEM द्वारा जारी किया गया नोटिस पूरी तरह से अस्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से गलत है।
नोटिस में ऐसा कोई ठोस आधार या सबूत नहीं था जो यह साबित कर सके कि उनकी गतिविधियों से वास्तव में शांति भंग होने की कोई आशंका थी। इसमें उस विशिष्ट अवधि, अवसर या कार्यक्रम का भी कोई उल्लेख नहीं था जिसके आधार पर यह कार्रवाई की गई। यह नोटिस सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का खुला उल्लंघन करता है।
दुर्भाग्यवश, दिल्ली हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया, जिसके बाद से छात्रों और न्यायप्रिय नागरिकों के बीच व्यवस्था के प्रति नाराजगी और अधिक भड़क उठी है।
छात्रों में जबरदस्त रोष, आंदोलन तेज होने के आसार
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक मशीनरी और पुलिस तंत्र के उस रवैये को बेनकाब कर दिया है जो सरकार से सवाल पूछने वाले हर युवा और छात्र नेता को अपराधी की तरह पेश करने पर उतारू है। आइसा और अन्य छात्र संगठनों ने इसे तानाशाही करार देते हुए चेतावनी दी है कि वे छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर होने वाले ऐसे किसी भी हमले को बर्दाश्त नहीं करेंगे।
आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर छात्रों का आक्रोश और सड़कों पर देखने को मिल सकता है, क्योंकि नेहा बोरा का यह तेवर अब युवा वर्ग के बीच एक बड़े प्रतिरोध का प्रतीक बनता जा रहा है।
