2027 से पहले यूपी में सियासी ट्रायल: एमएलसी चुनाव से कांग्रेस ने खींचे हाथ, दावेदारों को बड़ा झटका; भाजपा-सपा के बीच मुकाबले की राह हुई साफ

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उत्तर प्रदेश ,

​उत्तर प्रदेश(HRIDAY STAMBH);उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। प्रदेश विधान परिषद (MLC) की 11 स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों पर होने वाले चुनाव से कांग्रेस पार्टी ने अचानक अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। इस अप्रत्याशित फैसले ने जहां एक तरफ चुनाव की तैयारी में जुटे पार्टी के स्थानीय दावेदारों और नेताओं को गहरा झटका दिया है, वहीं दूसरी तरफ राज्य के राजनीतिक समीकरणों को भी पूरी तरह से बदल दिया है। अब इस मुकाबले का मैदान मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के आमने-सामने के संघर्ष के लिए साफ हो गया है।

​1. एक साल की लंबी तैयारी पर अचानक लगा विराम

​कांग्रेस पार्टी ने इन 11 एमएलसी सीटों (5 स्नातक और 6 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र) के लिए पिछले करीब एक साल से संगठनात्मक स्तर पर रणनीति बनानी शुरू कर दी थी:

  • ​पर्यवेक्षकों और समन्वयकों की नियुक्ति: पार्टी ने चुनाव को सुचारू रूप से चलाने और जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने के लिए विशेष प्रभारियों, पर्यवेक्षकों और समन्वयकों की तैनाती की थी।
  • ​कंट्रोल रूम का गठन: चुनावी गतिविधियों पर लगातार नजर रखने के लिए पार्टी मुख्यालय में एक विशेष कंट्रोल रूम भी सक्रिय किया गया था।
  • ​जमीनी संपर्क: संभावित उम्मीदवार पिछले कई महीनों से शिक्षकों, स्नातकों और स्थानीय मतदाताओं के बीच लगातार जनसंपर्क अभियान चला रहे थे।

​नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अचानक आए इस फैसले से महीनों से मेहनत कर रहे दावेदारों की पूरी रणनीति ध धरी रह गई।

​2. कांग्रेस का मुख्य फोकस: सिर्फ 2027 का विधानसभा चुनाव

​नवनिर्वाचित प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष आराधना मिश्रा ‘मोना’ ने इस फैसले के पीछे की वजह स्पष्ट करते हुए कहा कि पार्टी का इस समय एकमात्र और पूरा ध्यान वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर केंद्रित है।

​राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीतिक कदम के पीछे मुख्य उद्देश्य समाजवादी पार्टी (SP) के साथ ‘इंडिया’ गठबंधन (INDIA Alliance) के तालमेल को और अधिक मजबूत बनाए रखना है। विधान परिषद के इन चुनावों में सीधे तौर पर सपा के खिलाफ उतरने से आपसी खटाas बढ़ सकती थी, जिसे कांग्रेस विधानसभा चुनाव से पहले टालना चाहती है। पार्टी अपनी पूरी ऊर्जा, संसाधन और संगठनात्मक ताकत को बिखेरने के बजाय सीधे 2027 की बड़ी जंग में झोंकना चाहती है।

3. टिकटार्थियों में भारी नाराजगी और निर्दलीय उतरने का विकल्प

​अचानक लिए गए इस निर्णय से टिकट के दावेदारों में भारी असंतोष और असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। कई ऐसे नेता जिन्होंने महीनों से अपनी जमीन तैयार करने में समय और धन दोनों खर्च किए थे, वे खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

  • ​पार्टी का रुख: प्रदेश नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी आधिकारिक तौर पर चुनाव नहीं लड़ेगी। हालांकि, जो नेता चुनाव मैदान में डटे रहना चाहते हैं, उन्हें पार्टी की ओर से निर्दलीय (Independent) उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाने की छूट दे दी गई है।

  • ​बागी तेवर: कई संभावित उम्मीदवार (जैसे वाराणसी स्नातक सीट से तैयारी कर रहे अरविंद सिंह पटेल आदि) ने पार्टी के समर्थन के बिना भी मैदान में डटे रहने और निर्दलीय पर्चा न खींचने का ऐलान किया है। इससे स्थानीय स्तर पर मुख्य दलों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

​4. अब आगे क्या? बीजेपी बनाम सपा सीधी टक्कर

​कांग्रेस के मैदान से हटने के बाद उत्तर प्रदेश की इन 11 एमएलसी सीटों पर मुकाबला पूरी तरह से भाजपा समर्थित उम्मीदवारों और समाजवादी पार्टी के बीच सिमट गया है।

​वर्तमान में 100 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधान परिषद में सत्ताधारी भाजपा गठबंधन के पास मजबूत बहुमत (83 सदस्य) है, जबकि समाजवादी पार्टी के पास 10 सदस्य हैं। ऐसे में यह चुनाव जहां एक तरफ सत्ता पक्ष के लिए अपने वर्चस्व को बनाए रखने की परीक्षा है, वहीं सपा के लिए अपनी संख्या बल को और मजबूत करने का बड़ा अवसर माना जा रहा है।

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