AIIMS गोरखपुर की ED डॉ. विभा दत्ता की बिगड़ी तबीयत, AIIMS ने निजी अस्पताल किया रेफर;

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गोरखपुर,

गोरखपुर(HRIDAY STAMBH);

पूर्वांचल के सबसे बड़े और आधुनिक इलाज के केंद्र के रूप में स्थापित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) गोरखपुर की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं और सुविधाओं पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक (ED) व मुख्य संरक्षक मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. विभा दत्ता की अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें एम्स के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया। हालांकि, जरूरी सुपर-स्पेशियल्टी उपकरण और कैथ लैब (Cath Lab) उपलब्ध न होने के कारण डॉक्टरों को अपनी ही प्रमुख को शहर के एक निजी अस्पताल (सवाना हॉस्पिटैलिटी) रेफर करना पड़ा।

इस घटना के बाद से एम्स की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक शिथिलता और 7 साल बाद भी एडवांस कार्डियोलॉजी सुविधाओं के अभाव को लेकर भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है।

आवास पर अचानक हुईं बेहोश, ग्रीन कॉरिडोर बनाकर किया गया शिफ्ट

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बुधवार (28 अक्टूबर) की शाम एम्स परिसर स्थित अपने सरकारी आवास पर डॉ. विभा दत्ता अचानक अचेत होकर गिर पड़ीं। आनन-फानन में स्टाफ और डॉक्टरों की टीम उन्हें एम्स के इमरजेंसी वार्ड में लेकर पहुंची। प्राथमिक इलाज और ईसीजी (ECG) जैसी बुनियादी जांचों के बाद डॉक्टरों ने हृदय संबंधी विस्तृत जांच (कार्डियक प्रोफाइल व एंजियोग्राफी) की जरूरत बताई।

लेकिन विडंबना यह रही कि जिस संस्थान की कमान उनके हाथों में है, वहां इसके लिए आवश्यक ‘कैथ लैब’ चालू ही नहीं थी। हालत की संवेदनशीलता को देखते हुए एम्स के डॉक्टरों ने समय गंवाए बिना ग्रीन कॉरिडोर बनवाया और पुलिस एस्कॉर्ट के साथ उन्हें शहर के एक निजी अस्पताल में शिफ्ट कराया।

निजी अस्पताल में जांच के बाद मिली राहत

निजी अस्पताल में वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट्स की देखरेख में डॉ. विभा दत्ता की एंजियोग्राफी और अन्य एडवांस कार्डियक जांचें की गईं। राहत की बात यह रही कि उनकी जांच रिपोर्ट सामान्य आई और स्थिति में तेजी से सुधार देखा गया। डॉक्टरों द्वारा स्वास्थ्य को स्थिर घोषित किए जाने के बाद गुरुवार (29 अक्टूबर) को वे डिस्चार्ज होकर वापस कार्यालय पहुंचीं और अपना कार्यभार संभाला।

7 साल बाद भी कैथ लैब अधर में, पूर्वांचल के मरीजों की भी वही लाचारी

गोरखपुर एम्स का उद्घाटन हुए 7 साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन यहां अब तक सुपर-स्पेशियल्टी विभाग पूरी तरह क्रियाशील नहीं हो पाए हैं।
कैथ लैब की कमी बनी बड़ी वजह ,एम्स में कैथ लैब की स्थापना न होने के कारण दिल का दौरा (हार्ट अटैक), एंजियोप्लास्टी और जटिल कार्डियक इमरजेंसी वाले मरीजों को लखनऊ या निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है।

मरीजों का दर्द: स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब एम्स की अपनी निदेशक को ही इलाज के लिए निजी अस्पताल पर निर्भर होना पड़ रहा है, तो आम जनता की लाचारी का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
उठ रहे प्रशासनिक सवाल

इस घटना ने एम्स प्रशासन के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें लगातार विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने की बात कही जाती रही है। करोड़ों रुपये के बजट और केंद्रीय संस्थान का दर्जा होने के बावजूद कैथ लैब और कार्डियोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर की इस लेती-लतीफी पर स्वास्थ्य मंत्रालय और एdesम्स बोर्ड पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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