शिवराज के बेटे ने अपनी ही सरकार को घेरा! जंगल में रहने वाले आदिवासी आखिर कागज कहां से लाएंगे?

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कोसम (HRIDAY STAMBH);कोसमीकोसमी में वन विभाग की कार्रवाई के बाद गरमाई मध्यप्रदेश की सियासत, प्रभावित आदिवासी परिवारों के समर्थन में धरने पर पहुंचे कार्तिकेय सिंह चौहान; केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल रुका अतिक्रमण हटाओ अभियान

एमपी डेस्क। मध्यप्रदेश में आदिवासियों के अधिकारों और वन विभाग की कार्रवाई को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय कृषि मंत्री एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि जंगलों में पीढ़ियों से रहने वाले आदिवासी आखिर अपने अधिकार साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज कहां से लाएंगे? कार्तिकेय के इस सवाल के बाद प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस शुरू हो गई है।
मामला शिवराज सिंह चौहान के संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले कोसमी गांव का है, जहां वन विभाग द्वारा अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान आदिवासी परिवारों के घरों को हटाए जाने का मामला सामने आया है। कार्रवाई से प्रभावित परिवारों में नाराजगी है। न्याय की मांग को लेकर आदिवासी परिवार कोसमी डिपो के बाहर धरने पर बैठ गए हैं। उनका कहना है कि वे लंबे समय से इस क्षेत्र में रह रहे हैं, ऐसे में उनके रहने और जीवनयापन के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

धरना स्थल पर पहुंचे कार्तिकेय, आदिवासी परिवारों को दिया भरोसा

सोमवार शाम शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय सिंह चौहान प्रभावित आदिवासी परिवारों से मिलने धरना स्थल पहुंचे। उन्होंने परिवारों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनीं और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।
इस दौरान कार्तिकेय ने वन विभाग की कार्रवाई और आदिवासियों से दस्तावेज मांगने की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जंगलों में पीढ़ियों से रहने वाले आदिवासी परिवार आखिर अपने पुराने निवास का प्रमाण देने के लिए कागजात कहां से लाएंगे? जिन लोगों का जीवन जंगल और उसके आसपास बीता है, जिनकी कई पीढ़ियां वहीं रहती आई हैं, उनसे अचानक दस्तावेजों की मांग करना कितना उचित है?
कार्तिकेय का यह सवाल सीधे तौर पर आदिवासियों के वन अधिकारों और सरकारी व्यवस्थाओं के बीच पैदा हो रही विसंगतियों की ओर इशारा करता है।

‘इन्हीं आदिवासियों के वोट से बनी है सरकार’

कार्तिकेय सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार को घेरते हुए कहा कि आदिवासी समाज का प्रदेश की राजनीति और सरकार बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है। इन्हीं लोगों के समर्थन और वोट से सरकार सत्ता में पहुंची है। इसके बावजूद यदि आदिवासी परिवारों के साथ अमानवीय व्यवहार होता है तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे सरकार से लड़ने के लिए धरना स्थल पर नहीं पहुंचे हैं, बल्कि सरकार के सामने प्रभावित परिवारों की परेशानी और उनके अधिकारों से जुड़ा सवाल रखने आए हैं।
उनका कहना था कि आदिवासी परिवारों की समस्या को संवेदनशीलता के साथ समझने की जरूरत है। केवल दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई करने से पहले यह भी देखना चाहिए कि संबंधित परिवार कितने वर्षों से उस स्थान पर रह रहे हैं और उनके अधिकारों की स्थिति क्या है।

शिवराज सिंह चौहान के हस्तक्षेप के बाद वन विभाग की कार्रवाई रुकी

कोसमी गांव में वन विभाग की अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का मामला केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान तक पहुंचा। इसके बाद उनके हस्तक्षेप से वन विभाग ने फिलहाल अभियान रोक दिया है।
हालांकि कार्रवाई रुकने के बावजूद प्रभावित आदिवासी परिवारों का आक्रोश शांत नहीं हुआ है। परिवारों का कहना है कि केवल कार्रवाई रोक देना उनकी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। उन्हें अपने घरों, जमीन और भविष्य की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट न्याय चाहिए।
आदिवासी परिवारों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि उनके साथ किसी प्रकार का अन्याय न हो।

बुधवार तक न्याय नहीं मिला तो भोपाल में होगा आंदोलन

कोसमी डिपो के बाहर धरने पर बैठे प्रभावित परिवारों ने प्रशासन और सरकार को चेतावनी दी है कि यदि बुधवार तक उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो वे गुरुवार से भोपाल में धरना शुरू करेंगे।
परिवारों का कहना है कि वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलेगा, …

वन अधिकार कानून के तहत क्या हैं आदिवासियों के अधिकार?

इस पूरे मामले ने एक बार फिर वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों पर चर्चा शुरू कर दी है। इस कानून का उद्देश्य वन क्षेत्रों में लंबे समय से रहने वाले अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासियों के अधिकारों को मान्यता देना है।
कानून के तहत पात्र वनवासियों को व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार दिए जाने का प्रावधान है। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत ग्रामसभा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वन अधिकारों के दावों का परीक्षण और सत्यापन भी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है।
ऐसे में कोसमी का मामला केवल अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर रहा है कि वन क्षेत्रों में पीढ़ियों से निवास कर रहे आदिवासी परिवारों के अधिकारों का निर्धारण किस तरह किया जा रहा है।

अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती

कोसमी में वन विभाग की कार्रवाई के बाद पैदा हुए विवाद ने मोहन यादव सरकार के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की सरकारी कार्रवाई है तो दूसरी तरफ आदिवासी परिवारों के परंपरागत निवास और कानूनी अधिकारों का सवाल है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्तारूढ़ दल से जुड़े केंद्रीय मंत्री के बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान ने भी प्रभावित आदिवासियों के पक्ष में आवाज उठाई है और सरकार की व्यवस्था पर सवाल किए हैं।
अब देखना होगा कि प्रदेश सरकार और प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाते हैं। क्या प्रभावित परिवारों के दावों की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह विवाद आने वाले दिनों में एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप लेगा? फिलहाल कोसमी में आदिवासी परिवारों का धरना जारी है और उनकी नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

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