ग्वालियर
कोर्ट ने मांगा रियासत के विलय का ‘कॉवेनेंट’, नेपाल से भी आई आपत्ति
ग्वालियर (HRIDAY STAMBH): ऐतिहासिक सिंधिया राजपरिवार के अरबों रुपये के संपत्ति विवाद में नया मोड़ आ गया है। ग्वालियर के अतिरिक्त जिला न्यायालय में सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान सर्वसम्मत समझौते (राजीनामा) पर अंतिम फैसला एक बार फिर टल गया है।
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मूल रिकॉर्ड और आजादी के समय हुए ‘कॉवेनेंट’ (Covenant) की प्रति तलब की है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी।
इसी बीच, नेपाल से आई एक नई आपत्ति ने इस कानूनी लड़ाई को और उलझा दिया है। आपत्ति दर्ज कराने वाले पक्ष का दावा है कि इस पारिवारिक बंटवारे और समझौते में उन्हें शामिल नहीं किया गया है।
क्या है कॉवेनेंट (Covenant) और कोर्ट ने क्यों मांगा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने उस कॉवेनेंट की प्रति भी मांगी है जो देश की आजादी के बाद रियासतों के भारत में विलय के समय तैयार की गई थी। इसी दस्तावेज में ये उल्लेख है कि, सिंधिया राजपरिवार की कौन-कौन सी संपत्तियां परिवार के पास रहेंगी और कौन – कौन सी सरकार को हस्तांतरित की जाएंगी। अदालत अब इस दस्तावेज के आधार पर संपत्तियों के विवरण का मिलान करेगी।
बुआओं और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच क्या है विवाद?
ये विवाद उस सिविल वाद से जुड़ा है, जिसमें वसुंधरा राजे, उषा राजे और यशोधरा राजे ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से पारिवारिक संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग करते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
बाद में सभी पक्षों के बीच आपसी सहमति बनने के बाद समझौता (राजीनामा) अदालत में पेश किया गया। इसी समझौते पर फिलहाल न्यायालय में सुनवाई चल रही है। हालांकि, मूल रिकॉर्ड हाईकोर्ट में होने के कारण निचली अदालत ने पूरा रिकॉर्ड तलब किया है।
हाईकोर्ट से मिला 4 सप्ताह का समय
एक तरफ जहां जिला अदालत में राजीनामे पर सुनवाई चल रही है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से हाईकोर्ट में भी याचिका दायर कर बंटवारे को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट को सूचित किया गया कि सिविल कोर्ट में समझौते पर प्रक्रिया जारी है, जिस पर हाईकोर्ट ने मामले में 4 सप्ताह का समय देते हुए सुनवाई आगे बढ़ा दी है।
