ग्वालियर
लगातार बढ़ते खनन से शहर की बिगड़ती व्यवस्था और इको सिस्टम
ग्वालियर (हृदय स्तंभ/HRIDAY STAMBH): अभी एक नई रिसर्च में सामने आया की उत्तरप्रदेश के बांदा का इकोसिस्टम काफ़ी बिगड़ रहा है इस साल ये 27 अप्रैल को सबसे गर्म रहा था जहाँ पिछले 10 साल में 20-25% पहाड़िया खनन में ख़त्म हो गई या इनका 50% से ज़्यादा हिसा तोड़ा जा चुका है यहाँ की केन नदी से 57000 टन प्रतिदिन रेत निकाली जा रही है जिसने यहाँ के इको सिस्टम को पूरी तरह हिलाकर रख दिया है
ऐसे ही कुछ हालत ग्वालियर जिले के भी है जहाँ आस पास गिट्टी और मौरम की खदानों ने या तो पहाड़िया गायब कर दी है या फिर 50% से ज़्यादा कम हो गई है यही हाल चंबल और सिंध नदी की रेत खनन का है जहाँ से प्रतिदिन हज़ारो टन रेत निकाली जा रही है जो इको सिस्टम को पूरी तरह प्रभावित करने के लिए काफ़ी है एनजीटी की कई बार की चेतावनी भी यहाँ कोई असर नहीं डालती दिख रही है यहाँ खनन इतना प्रभावी है की खनन के आगे जान की क़ीमत तक कम पद जाती है इसका उदाहरण यहाँ पुलिस और फारेस्ट के अधिकारियों की हुई मौत बताती है आए दिन ट्रेक्टर और डंपर से होते हादसे और चलती गोलिया इनका प्रभाव बताती है लेकिन इन सबसे भी ऊपर ये इको सिस्टम जो एक बार बिगड़ गया तो आने वाली पीढ़िया इनका दंश झेलेंगी।
अगर जल्द ही इस और ध्यान नहीं दिया गया तो इस शहर की आबोहवा भी बांदा जैसे शहरों की तरह दूषित हो जाएगी और यहाँ का इको सिस्टम भी पूरी तरह प्रभावित हो जाएगा
