पटना/रांची: उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में आज सतुआ संक्रांति (सतुआनी) का पर्व पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस दिन को मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है, जो न केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत है, बल्कि धार्मिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
सूर्य का मेष राशि में प्रवेश और नववर्ष का आरंभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूर्य देव मीन राशि से निकलकर अपने उच्च की राशि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य चक्र के आधार पर इसे सौर नववर्ष की शुरुआत भी माना जाता है। इसी दिन से एक महीने से चल रहा खरमास समाप्त हो जाता है, जिससे शादी-विवाह और मुंडन जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर लगी रोक हट जाती है।
सतुआनी मुख्य रूप से बढ़ती गर्मी के स्वागत का पर्व है। इस दिन से प्रकृति में तपन बढ़ने लगती है, इसलिए खान-पान में बदलाव की परंपरा है। सत्तू तासीर में ठंडा होता है। इस दिन सत्तू खाकर शरीर को आने वाली भीषण गर्मी के लिए तैयार किया जाता है।
परंपरा: लोग सुबह पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान के बाद कुल देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और फिर सत्तू का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सतुआनी पर दान का महत्व: क्या करें दान?
इस दिन दान करने का विशेष फल मिलता है। मान्यता है कि संक्रांति के दिन किया गया दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है। सतुआनी पर निम्नलिखित चीजों का दान श्रेष्ठ माना गया है:
1. सत्तू: इस दिन चने या जौ के सत्तू का दान सबसे महत्वपूर्ण है।
2. मिट्टी का घड़ा (कलश): गर्मी की शुरुआत होने के कारण जल से भरे मिट्टी के घड़े का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
3. गुड़ और आम: सत्तू के साथ गुड़ और टिकोला (कच्चा आम) दान करने की परंपरा है।
4. पंखे और खड़ाऊं: गर्मी से राहत देने वाली वस्तुएं जैसे हाथ का पंखा या जूते-चप्पल दान करना भी फलदायी होता है।
बिहार में सतुआनी के दिन सत्तू को केवल भोजन नहीं, बल्कि औषधि माना जाता है। लोग सत्तू में नमक, मिर्च, प्याज और आम का अचार मिलाकर इसे चाव से खाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लू और डिहाइड्रेशन से बचने के लिए सत्तू का सेवन एक अचूक देसी नुस्खा है।
