कटनी और शहडोल जिलों की रेत खदान के टेंडर रद्द करने पर हाईकोर्ट की मुहर

राज्य

जबलपुर

2 कंपनियों की याचिकाएं खारिज
जबलपुर। मप्र उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा तथा न्यायाधीश विनय सराफ की संयुक्तपीठ ने एक मामले में कटनी और शहडोल जिलों की रेत खदानों के टेंडर निरस्त करने के राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए अपने आदेश में कहा ‎ कि सरकारी राजस्व को नुकसान से बचाने के लिए लिया गया निर्णय न्यायोचित है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। कि इस मत के साथ न्यायालय ने इस मामले में दो कंपनियों की ओर से दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया।
यह मामला रेत खदानों के टेंडर प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसमें मुंबई की सहकार ग्लोबल लिमिटेड और होशंगाबाद की धनलक्ष्मी मर्चेंडाइज ने शहडोल और कटनी जिलों की रेत खदानों के ठेके पहले उच्च बोली (हाई बिड) लगाकर हासिल किए थे। लेकिन बाद में दोनों कंपनियों ने अपने ठेके सरेंडर कर दिए। इसके बाद सरकार ने नए टेंडर जारी किए, जिसमें इन्हीं कंपनियों ने पहले से कम बोली लगाई। राज्य सरकार को इस पूरे घटनाक्रम में गड़बड़ी नजर आई। सरकार का तर्क था कि पहले ऊंची बोली लगाना और फिर ठेका छोड़ना। फिर कम बोली लगाकर दोबारा टेंडर हासिल करने की कोशिश करना, यह एक तरह का टेंडर में हेरफेर है।
प्रकरण में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली तथा स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता निलेश यादव ने पक्ष रखते हुए न्यायालय को अपवगत कराया कि एक मामले में लगभग 10 करोड़ रुपए और दूसरे में 20 करोड़ रुपए से अधिक के भारी राजस्व नुकसान की संभावना थी इसलिए स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन के बोर्ड ने 19 नवंबर 2025 को टेंडर प्रक्रिया रद्द करने का निर्णय लिया।
सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय की संयुक्तपीठ ने अपने फैसले में कहा कि कंपनियों द्वारा कम बोली लगाकर खेल करने की कोशिश की गई। इससे सरकार को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता था। ऐसे में सरकार का टेंडर रद्द करने का निर्णय सही और वैध है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “सरकार के इस फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है”।
हालांकि अपने आदेश में संयुक्तपीठ ने कंपनियों को एक सीमित राहत भी दी वे भविष्य में निकलने वाले नए टेंडर में भाग ले सकती हैं और यह फैसला उनके लिए बाधा नहीं बनेगा।

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