3 करोड़ या सवा करोड़?” SIR पर केंद्र और UP सरकार के आंकड़ों में उलझा पेच,राहुल गांधी का दावा ही सच: आराधना मिश्रा ‘मोना’

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लखनऊ,

लखनऊ(HRIDAY STAMBH);

उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक पारा अचानक चढ़ गया है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री और विधायक दल की पूर्व नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ ने केंद्र और राज्य सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बयानों में भारी विरोधाभास का दावा करते हुए कहा कि दोनों सरकारों के आंकड़े एक-दूसरे को नकार रहे हैं, जिससे साफ होता है कि SIR की आड़ में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई है।

शीर्ष नेतृत्व के आंकड़ों में बड़ा विरोधाभास

आराधना मिश्रा ने केंद्र और राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि दोनों स्तरों से आ रहे बयानों ने जनता के सामने भ्रम और अविश्वास की स्थिति पैदा कर दी है:
“एक तरफ देश के गृह मंत्री का दावा है कि 3 करोड़ घुसपैठियों के नाम काटे गए हैं, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री खुद मान रहे हैं कि केवल यूपी में SIR के तहत सवा करोड़ नाम गलत कट गए हैं। अब देश की जनता यह जानना चाहती है कि किसकी बात पर भरोसा किया जाए? दोनों बड़े नेताओं को पहले आपस में बैठक कर यह तय कर लेना चाहिए कि असली आंकड़ा क्या है।”

राहुल गांधी के दावों पर लगाई मुहर

कांग्रेस नेता ने राहुल गांधी द्वारा उठाए गए आंकड़ों का मजबूती से समर्थन करते हुए कहा कि मामला सिर्फ एक राज्य का नहीं, बल्कि पूरे देश का है:

देशभर में 13 करोड़ से अधिक नाम कटे: राहुल गांधी ने जो तथ्य देश के सामने रखे हैं, वही जमीनी हकीकत है। SIR प्रक्रिया की आड़ में पूरे भारत में 13 करोड़ से भी ज्यादा वैध नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
उत्तर प्रदेश बना सबसे बड़ा शिकार: देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में इस प्रक्रिया का सबसे व्यापक असर पड़ा है, जहां करोड़ों नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया है।
प्रशासनिक विफलता पर तंज:

मुख्यमंत्री का यह स्वीकारना कि सवा करोड़ नाम गलत कटे हैं, राज्य सरकार की प्रशासनिक लाचारी और चुनावी मशीनरी में बड़ी चूक को दर्शाता है।
लोकतंत्र और मताधिकार पर बड़ा खतरा

आराधना मिश्रा ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में SIR के नाम पर फर्जीवाड़े की स्थिति बन चुकी है। आम जनता, गरीब और सीमांत वर्गों के नाम जिस तरह मतदाता सूचियों से गायब किए गए हैं, वह सीधे तौर पर लोकतंत्र और संविधान द्वारा दिए गए मताधिकार पर हमला है।

उन्होंने मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिन वैध नागरिकों के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें तुरंत पुनर्जीवित कर मतदाता सूची में जोड़ा जाए।

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