पीताम्बरा माई की रथयात्रा और नेताओं का सियासी सफर: अंधविश्वास या महज इत्तेफाक?

दतिया

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जानें दतिया के राजनीतिक मिथक का सच

दतिया ( NEWS UPDATE): राजसत्ता की देवी मानी जाने वाली मां पीताम्बरा की नगरी दतिया की राजनीति में इन दिनों एक लोक-मिथक सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में फिर चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल उठ रहा है कि क्या साल 2022 में निकली मां पीताम्बरा माई की भव्य रथयात्रा में रथ खींचना भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दिग्गज नेताओं के लिए भारी पड़ गया?

सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि जिन बड़े नेताओं ने 4 मई 2022 को मां पीताम्बरा का रथ खींचा था, उन्हें बाद में अपने-अपने राजनीतिक पदों से हाथ धोना पड़ा या चुनावी राजनीति में बड़ा झटका लगा। आइए समझते हैं कि इस मिथक की शुरुआत कैसे हुई और तथ्य एवं राजनीति के बीच का अंतर क्या है।

आखिर कैसे शुरू हुई दतिया में पीताम्बरा माई की रथयात्रा?

मां पीताम्बरा सिद्धपीठ को देश के सबसे प्रमुख धार्मिक और तंत्र साधना स्थलों में गिना जाता है। यहां मां पीताम्बरा के साथ चौसठ योगिनी और मां धूमावती विराजमान हैं। देश भर के राजनेताओं और सत्ता के गलियारों से जुड़े लोगों की इस पीठ में अटूट आस्था रही है।

मंदिर से जुड़े सूत्रों और जानकारों के अनुसार, पीताम्बरा पीठ के इतिहास में पहले कभी जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर रथयात्रा निकालने की परंपरा नहीं रही है। साल 2021-22 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा विभिन्न शहरों के ‘गौरव दिवस’ मनाने की शुरुआत की गई। इसी कड़ी में दतिया गौरव दिवस को मां पीताम्बरा के प्राकट्य दिवस (4 मई) के साथ जोड़ा गया और 4 मई 2022 को पहली बार माई की भव्य नगर रथयात्रा निकाली गई।

दिग्गज नेताओं ने खींचा था माई का रथ आज उनकी राजनीतिक परिस्थित

रथयात्रा में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, तत्कालीन गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा और राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया सहित कई नेता शामिल हुए थे। रथयात्रा के दौरान नेताओं के रथ खींचने की तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए थे। उस समय आयोजन को धार्मिक आस्था और दतिया की नई पहचान से जोड़कर देखा गया था।

2023 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा को दतिया सीट पर कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ। भाजपा को बहुमत मिलने के बावजूद शिवराज सिंह चौहान की जगह डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया गया। राजस्थान में भी वसुंधरा राजे की जगह भजनलाल शर्मा मुख्यमंत्री बने। इन घटनाओं को दतिया में रथयात्रा के साथ जोड़कर यह चर्चा शुरू हुई कि जिन बड़े नेताओं ने रथ खींचा था, उन्हें बाद में सत्ता या चुनावी राजनीति में झटका लगा।

2026 के उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना और भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की हार के बाद नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर रथयात्रा वाला मिथक फिर सामने आने लगा है।

स्थापित परंपराओं से अलग जाकर निकाली गई थी रथयात्रा

इसी के साथ यह दावा भी किया जाने लगा कि मां पीताम्बरा को राजसत्ता की देवी माना जाता है और उनकी स्थापित परंपराओं से अलग जाकर निकाली गई रथयात्रा में शामिल होने वाले नेताओं को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। लेकिन इस दावे को समझने के लिए आस्था और तथ्य के बीच अंतर करना जरूरी है।

हालांकि जब यात्रा निकाली गई थी तब उस समय भी कुछ स्थानीय निवासियों को ये अनुचित लग रहा था उनका तर्क स्वामी जी के नियमों के अंतर्गत था

 

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