लखनऊ :
देश के निजी मेडिकल कॉलेजों में NEET UG और NEET PG की फीस बढ़ाने के फैसले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। 1 सितंबर 2026 के एक कथित आदेश का हवाला देकर वर्ष 2024 और 2025 के जारी बैचों पर बढ़ी हुई फीस का वित्तीय बोझ डाल दिया गया है। इस निर्णय से हजारों मेडिकल छात्र और उनके अभिभावक बेहद आक्रोशित हैं और इसे सरासर मनमानी व अन्याय बता रहे हैं।
पुराने सत्रों पर क्यों थोपा गया फैसला?
छात्रों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि फीस नियंत्रण बोर्ड या शासन द्वारा जब भी कोई नया शुल्क नियम लागू किया जाता है, तो उसे आगामी शैक्षणिक सत्र से लागू किया जाना चाहिए।
2026 बैच के बजाय पुराने बैच पर असर: प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि यदि फीस में वृद्धि आवश्यक ही थी, तो इसे 2026 के नए प्रवेश लेने वाले बैच पर लागू किया जाना चाहिए था। 2024 और 2025 के छात्रों ने जिस निर्धारित फीस संरचना के तहत प्रवेश लिया था, बीच सत्र में उसमें बढ़ोतरी करना नियमों के विपरीत है।
हाईकोर्ट आदेश पर उठे गंभीर सवाल
अभिभावकों का आरोप है कि इस फीस वृद्धि के पीछे किसी आधिकारिक कोर्ट आदेश की आड़ ली जा रही है, जबकि वास्तव में उच्च न्यायालय द्वारा ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश जारी नहीं हुआ है। छात्रों ने आरोप लगाया कि फर्जी आदेश और सांठगांठ के जरिए कॉलेजों को अनुचित लाभ पहुंचाया जा रहा है।
‘मिलन कार्यक्रम’ पर संदेह: कई निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा हाल ही में आयोजित ‘मिलन कार्यक्रमों’ और बैठकों की मंशपर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि इन आयोजनों के माध्यम से बैकडोर से वित्तीय नीतियां तय की गई हैं।
मानसिक और वित्तीय दबाव में मेडिकल छात्र
डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे छात्रों का कहना है कि पहले ही निजी कॉलेजों की फीस काफी अधिक होती है। अचानक लाखों रुपये का अतिरिक्त शुल्क थोपे जाने से मध्यमवर्गीय परिवारों के सामने भारी आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
छात्रों का तर्क है कि यदि यह नीति बिना किसी भेदभाव के सभी पर एक साथ पारदर्शी तरीके से लागू की जाती, तो इसे प्रशासनिक आदेश माना जा सकता था। लेकिन चुनिंदा रूप से पुराने बैचों को निशाना बनाना सीधे तौर पर नीतिगत भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
छात्रों की मुख्य मांगें
1. 2024 और 2025 बैच के लिए बढ़ी फीस तत्काल रद्द हो: पुराने छात्रों को उनकी मूल फीस संरचना पर ही पढ़ाई पूरी करने दी जाए।
2. हाईकोर्ट आदेश के नाम पर चल रहे भ्रम की जांच: 1 सितंबर 2026 के आदेश और निजी कॉलेजों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
3. पारदर्शी शुल्क ढांचा: भविष्य में फीस संबंधी किसी भी फैसले को केवल नए शैक्षणिक सत्र (2026 onwards) से ही लागू किया जाए।
यदि सरकार और संबंधित मेडिकल काउंसिल द्वारा इस फैसले को जल्द वापस नहीं लिया गया, तो छात्रों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने और मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की चेतावनी दी है।
