हेड हंटर्स: कारगिल युद्ध में जब ‘नागा रेजिमेंट’ के खौफ से भाग खड़े हुए थे

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नई दिल्ली

पाकिस्तानी सैनिक, जानिए जांबाजों की शौर्य गाथा

नई दिल्ली (NEWS UPDATE): भारतीय सेना में गोरखा, राजपूत, सिख, गढ़वाल और कुमाऊं जैसी कई रेजिमेंट्स हैं, जिनका अपना एक गौरवशाली इतिहास और लेगेसी रही है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी रेजिमेंट भी है, जिसे दुश्मन ‘यमराज का दूसरा रूप’ मानते हैं। हम बात कर रहे हैं नागा रेजिमेंट (Naga Regiment) की, जिन्हें सेना में ‘हेड हंटर्स’ (Head Hunters) के नाम से जाना जाता है।

अदम्य साहस और बेजोड़ वीरता के प्रतीक इस रेजिमेंट के नाम 1 महावीर चक्र, 8 वीर चक्र, 6 शौर्य चक्र, 1 युद्ध सेवा मेडल, 1 विशिष्ट सेवा मेडल और 48 सेना मेडल दर्ज हैं। आइए जानते हैं आखिर क्यों इस रेजिमेंट का नाम सुनते ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते हैं।

पूर्वजों से विरासत में मिली ‘सिर काटने’ की परंपरा!

नागा रेजिमेंट के सैनिक जम्मू-कश्मीर और एलओसी (LoC) के आम लोगों के बीच दुश्मनों से निपटने के अपने अनोखे और आक्रामक तरीकों के लिए जाने जाते हैं। दरअसल, नागा समुदाय में सदियों पहले ‘हेड हंटिंग’ (दुश्मनों के सिर काटने) की परंपरा थी, जहां युद्ध में दुश्मन का सिर लाना विजय और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता था। आज भले ही वह दौर बदल चुका है, लेकिन दुश्मनों के दिलों में खौफ पैदा करने का उनका जज्बा आज भी वही है।

हेड हंटर्स जम्मू कश्मीर और LOC के आम लोगों के बीच दुश्मनों को पकड़ने और उनसे निपटने के अपने असामान्य तरीकों की कहानियों के लिए काफी लोकप्रिय हैं…ये लोग अपनी समुदाय की उस लेगेसी को आगे बढ़ाते हैं जो उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है नागा लोग कभी सिर इकट्ठा करने की परंपरा का पालन करते थे,जिसमें दुश्मनों के सिर को इकट्ठा करना विजय के प्रतीक था और इससे उनको पाजिटिव एनर्जी मिलती थी।

कारगिल युद्ध: जब मुश्किल वक्त में सेना ने ‘नागाओं’ को पुकारा

साल 1999 में जब कारगिल युद्ध की शुरुआत हुई, तो भारतीय सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। पाकिस्तानी घुसपैठिए ऊंची चोटियों पर मजबूत सप्लाई लाइन के साथ बैठे थे, जिसका उन्हें रणनीतिक फायदा मिल रहा था। निचली और कठिन जगहों पर होने के कारण राजपूत, सिख और जैक लाइट इन्फैंट्री (JAKLI) जैसी रेजिमेंट्स को भारी हताहत झेलना पड़ रहा था।

हालाँकि कुमाऊं और गोरखा रेजिमेंट कुछ मोर्चों पर बेहतर कर रही थीं, लेकिन दुश्मन को पूरी तरह खदेड़ने के लिए सेना ने अपनी रणनीति बदली और नागा रेजिमेंट को मोर्चे पर बुलाया।

शेरपाओं जैसी ताकत, दाओ से किया वार

एवरेस्ट पर चढ़ने वाले शेरपाओं की तरह नागा सैनिक बचपन से ही खड़ी पहाड़ियों और कठिन रास्तों पर चलने के अभ्यस्त होते हैं। नागा रेजिमेंट के जवानों ने बिना वक्त गंवाए करगिल की सीधी पहाड़ियों पर चढ़ाई शुरू की। कहा जाता है कि उन्होंने अपने पारंपरिक हथियार ‘दाओ’ (एक प्रकार का घातक कतरनार हथियार) से कई पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और टाइगर हिल जैसी कई महत्वपूर्ण चौकियों को वापस तिरंगे के साये में ला खड़ा किया।

जब नागाओं के आने की खबर से बढ़ जाता था बाकी यूनिट्स का जोश

नागा सैनिकों में अपनी कम्युनिटी और देश के लिए वफादारी कूट-कूट कर भरी होती है। करगिल युद्ध पर बनी कई डॉक्युमेंट्रीज में अन्य रेजिमेंट के सैनिकों ने स्वीकार किया है कि जब युद्ध के मैदान में यह खबर आती थी कि ‘नागा रेजिमेंट’ उनकी मदद के लिए आ रही है, तो पूरी यूनिट का जोश सातवें आसमान पर पहुंच जाता था।

वो किस्सा, जब नागाओं के ‘खौफ’ से पूरी पोस्ट छोड़कर भाग गए पाकिस्तानी

एक बार ऐसे ही कहानी इनकी प्रचलित हुई थी कि एक भारतीय पोस्ट जो जंगलो से घीरी थी,उस पर पाक एंबुश करने का सोच रहा था…पर भारतीय सेना को भनक पड़ गई,फिर नागाओं ने पेट्रोलिंग पर ही एक पाकिस्तानी को पकड़ा और पैर काटने जैसी रिहर्सल करके पेड़ से बांध कर उसके आसपास नाचने लगे ,जैसे उसको खाने से पहले का कोई रिचुअल कर रहे हो

फिर उस पाकिस्तानी को जान बुझ कर रात को भगा दिया उन्होने,उसे लगा कि वो खुद चुंगल से भागा हो, वो कैसे भी पाकिस्तानी पोस्ट पर पहुंचा और सारी कहानी बताई कि कैसे नागा उनको खाने जाने वाले थे..कहते हैं कि अगले दिन जब भारतीय सेना उन तक पहुंची तो उनका सारा साजो समान वही था,पर उनका कोई ठिकाना नही था

ये खौफ हैं नागाओं का, भले दुश्मन के अंग काटने की कहानियाँ बहुतों को बनावटी लगती हो, पर दुश्मन सिर काटकर वापस लाने की बातों का सबूत आपको बहुत सी नागा कम्युनिटी में दिख जाएंगी

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