कोलारस
कोलारस की सड़कों पर इन दिनों विकास की नहीं, बल्कि नगर परिषद की नाकामी की धूल उड़ रही है। आलम यह है कि शहर के मुख्य मार्गों से लेकर अंदरूनी गलियों तक सांस लेना दूभर हो गया है। बच्चे खांस रहे हैं और बुजुर्गों का दम फूल रहा है, लेकिन प्रशासन गहरी नींद में है। कैमरे के सामने कोलारस के अधिकारी और नेता विकास के लंबे-चौड़े दावे तो कर देते हैं, लेकिन कैमरा बंद होते ही जनता की सेहत भी उनकी प्राथमिकता से ‘ऑफ’ हो जाती है। न सड़कों पर पानी का छिड़काव हो रहा है और न ही धूल को नियंत्रित करने का कोई ठोस प्रयास। यह स्थिति किसी विकास की नहीं, बल्कि ‘धीमे जहर’ जैसी है जो धीरे-धीरे नागरिकों को बीमार बना रही है।
हैरानी की बात यह है कि नगर परिषद हर महीने सफाई व्यवस्था पर लाखों रुपये खर्च करने का दावा करती है। लगभग 40 से 50 सफाई कर्मचारियों की फौज और भारी-भरकम बजट के बावजूद जमीनी हकीकत इसके उलट है। एबी रोड जैसे प्रमुख मार्ग पर धूल की इतनी मोटी परत जमी है कि वाहनों के गुजरते ही गुबार छा जाता है। घर से नहा-धोकर निकला व्यक्ति मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते धूल में सन जाता है। सड़क किनारे स्टॉल लगाने वाले और दुकानदार दिन भर धूल की परतें साफ करते थक जाते हैं, लेकिन परिषद के जिम्मेदार अधिकारी अपनी मस्ती में मस्त हैं। परिषद के दावे कागजों तक ही सीमित नजर आते हैं। नियमित सफाई का ढिंढोरा तो पीटा जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि झाड़ू केवल किनारे की मिट्टी को एक जगह से दूसरी जगह खिसका देती है, जिससे धूल कम होने के बजाय हवा में और ज्यादा घुल जाती है। बारिश के बाद सड़कों के किनारों पर जमी मिट्टी अब सूखकर जानलेवा बन चुकी है। डॉक्टरों का भी मानना है कि हवा में तैरते ये कण दमा, एलर्जी और आंखों के संक्रमण जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। जनता में भारी नाराजगी है कि नियम तोड़ने पर तो आम आदमी से चालान वसूला जाता है, लेकिन शहर को धूल के ढेर में झोंकने वाले जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। कोलारस की जनता अब नारों और भाषणों से ऊब चुकी है, उन्हें केवल इस जानलेवा धूल से निजात चाहिए। यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह धूल न केवल लोगों के स्वास्थ्य को चौपट करेगी बल्कि नगर परिषद की बची-कुची साख को भी मिट्टी में मिला देगी।
