ओमान के रास्ते जहाजों को मिल सकती है मंजूरी
तेहरान/वॉशिंगटन: वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण मार्ग माने जाने वाले ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को लेकर लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब कम होता दिख रहा है। ईरान ने एक बड़े कूटनीतिक बदलाव का संकेत देते हुए प्रस्ताव दिया है कि वह ओमान के जल क्षेत्र से जहाजों के सुरक्षित आवागमन की अनुमति दे सकता है।
ईरान का नया प्रस्ताव और कूटनीतिक हलचल
अमेरिका और ईरान के बीच जारी पर्दे के पीछे की बातचीत में तेहरान ने एक लचीला रुख अपनाया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने यह पेशकश की है कि व्यापारिक जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट के उस हिस्से से गुजरने दिया जाए जो ओमान की सीमा में आता है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य खाड़ी क्षेत्र में सैन्य टकराव की स्थिति को टालना और ठप पड़ी कूटनीतिक चर्चाओं को दोबारा पटरी पर लाना है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा वहन करता है, इसलिए यहाँ शांति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
अमेरिकी नौसेना की कड़ी निगरानी और नाकेबंदी
एक तरफ जहाँ कूटनीतिक बातचीत चल रही है, वहीं दूसरी तरफ जमीन (और समुद्र) पर तनाव बरकरार है। यूएस सेंट्रल कमांड ने स्पष्ट किया है कि उनकी चौकसी में कोई कमी नहीं आई है। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत ओमान की खाड़ी में सक्रिय रूप से गश्त कर रहे हैं अमेरिका उन जहाजों पर कड़ी नजर रख रहा है जो ईरानी बंदरगाहों की ओर जा रहे हैं या वहां से आ रहे हैं। सेंटकॉम के अनुसार, अमेरिकी सेना नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
बदले गए रास्ते: नौ जहाजों को लौटना पड़ा
अमेरिकी नाकेबंदी का असर अब समुद्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। यूएस सेंट्रल कमांड द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 48 घंटों के भीतर एक भी जहाज अमेरिकी सैन्य घेरे को पार करके ईरानी बंदरगाहों तक पहुँचने में सफल नहीं हुआ है। अमेरिकी सेना के निर्देशों और चेतावनी के बाद 9 बड़े जहाजों ने अपना रास्ता बदल लिया। ये जहाज या तो वापस मुड़ गए या किसी अन्य तटीय क्षेत्र की ओर चले गए, जिससे ईरान के समुद्री व्यापार पर सीधा दबाव पड़ा है
ईरान की यह ‘नरमी’ उसकी मजबूर अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय दबाव का परिणाम मानी जा रही है। यदि ओमान के रास्ते जहाजों को मंजूरी देने का यह प्रस्ताव हकीकत में बदलता है, तो यह मध्य-पूर्व में तनाव कम करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। हालांकि, अमेरिका की सख्त सैन्य घेरेबंदी यह साफ करती है कि वॉशिंगटन केवल वादों पर नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई पर भरोसा करेगा।
