धूल भरे गांव से आईपीएल तक: मंगेश यादव की कहानी, संघर्ष, सपनों और पिता के त्याग की मिसाल

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नई दिल्ली

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के छोटे से गांव बोरगांव से निकलकर रॉयल चेलेंजर बेंगलुरु तक पहुंचने वाले मंगेश यादव का सफर सिर्फ 5.2 करोड़ रुपये की बोली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक परिवार के संघर्ष, त्याग और अटूट विश्वास की कहानी है। यह कहानी बताती है कि कठिन परिस्थितियां भी उस इंसान को नहीं रोक सकतीं, जिसके पास प्रतिभा और उसे तराशने वाला सही मार्गदर्शक हो।
मंगेश के पिता रामावध यादव ट्रक ड्राइवर रहे हैं, जिनकी जिंदगी लगातार सफर, अनिश्चित आय और कठिन हालातों से भरी रही। दिन-रात मेहनत करने के बावजूद उनके मन में एक ही सपना था अपने बेटे को एक बेहतर भविष्य देना। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने मंगेश की ट्रेनिंग कभी नहीं रुकने दी, चाहे इसके लिए उन्हें उधार ही क्यों न लेना पड़ा हो। कई रातें उन्होंने यह सोचते हुए बिताईं कि अगली फीस कहां से आएगी, लेकिन बेटे के हौसले को टूटने नहीं दिया। मंगेश की प्रतिभा को पहली पहचान तब मिली जब उनके चाचा ने उन्हें दिल्ली भेजने की सलाह दी। पिता ने जैसे-तैसे 24,000 रुपये जुटाए और उन्हें कोच फूलंचंद शर्मा के पास भेज दिया। दिल्ली में शुरुआती संघर्ष बेहद कठिन रहा न रहने की जगह, न खाने का ठिकाना। लेकिन कोच ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें सहारा दिया और रहने-खाने की व्यवस्था करवाई। यही वह मोड़ था, जिसने मंगेश के करियर को नई दिशा दी।
हालांकि, इस सफर में एक दौर ऐसा भी आया जब मंगेश अनुशासन से भटक गए। तब उनके कोच ने सख्ती दिखाते हुए उन्हें घर लौटने तक की चेतावनी दे दी। यह झटका मंगेश के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उन्होंने खुद को संभाला और फिर पूरी मेहनत के साथ क्रिकेट में जुट गए। डीडीसीए लीग से लेकर यूपी अंडर-19 कैंप तक उन्होंने लगातार मेहनत की, हालांकि कई बार चयन न होने की निराशा भी झेलनी पड़ी।
उनकी मेहनत का असली फल ‘मध्य प्रदेश टी20 लीग’ में मिला, जहां उन्होंने 6 मैचों में 14 विकेट लेकर सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बाद उन्हें आरसीबी के ट्रायल के लिए बुलाया गया, जहां दिनेश कार्तिक ने उनकी काबिलियत को परखा। मंगेश ने हर स्थिति में खुद को साबित किया और अंततः उन्हें 5.2 करोड़ रुपये में टीम ने अपने साथ जोड़ लिया। आज मंगेश की सफलता उनके पिता के संघर्ष का सम्मान है। जो लोग कभी उनके सपनों का मजाक उड़ाते थे, वही अब उनकी सराहना कर रहे हैं। मंगेश के लिए सबसे बड़ी जीत पैसा नहीं, बल्कि अपने पिता के चेहरे पर गर्व की मुस्कान है, जिसने इस पूरे सफर को सार्थक बना दिया।

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