एलपीजी संकट: मोदी सरकार का प्लान-बी हुआ सक्रिय, घरेलू उत्पादन में 10 प्रतिशत की वृद्धि

देश विदेश

नई दिल्ली

पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को हिलाकर रख दिया है। युद्ध के कारण तेल और गैस की किल्लत का असर अब भारत में भी दिखने लगा है, जिससे विशेष रूप से एलपीजी (रसोई गैस) की आपूर्ति पर संकट गहरा गया है। हालांकि, इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार तत्काल एक्शन मोड में आ गई है। सरकार ने न केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने के आदेश दिए हैं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने प्लान-बी को भी धरातल पर उतार दिया है। रणनीतिक विविधीकरण के तहत अब अल्जीरिया, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और नॉर्वे जैसे देशों से एलएनजी और एलपीजी की अतिरिक्त खेपें भारत पहुंचने लगी हैं।
वैश्विक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित अवरोधों के कारण ऊर्जा संकट की आशंकाओं के बीच, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों—आईओसीएल, बीपीसीएल और एचपीसीएल—ने एलपीजी के घरेलू उत्पादन में 10 प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी है। सरकार की प्राथमिकता स्पष्ट है कि वाणिज्यिक उपयोग के बजाय घरेलू उपभोक्ताओं को गैस की निर्बाध आपूर्ति मिलती रहे। इसी कड़ी में वाणिज्यिक एलपीजी के उपयोग पर सख्ती बरती जा रही है और तीन कार्यकारी निदेशकों की एक उच्च स्तरीय समिति आपूर्ति की निरंतर निगरानी कर रही है ताकि गैर-जरूरी व्यवसायों द्वारा गैस की जमाखोरी को रोका जा सके। भारत की गैस जरूरतों के आंकड़ों पर नजर डालें तो एलएनजी की सोर्सिंग में कतर 42.22 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, जिसके बाद अमेरिका (18.5 प्रतिशत) और यूएई (11.11 प्रतिशत) का स्थान आता है। एलपीजी के मामले में भारत की निर्भरता खाड़ी देशों पर अत्यधिक है, जहां यूएई और कतर मिलकर 62 प्रतिशत से अधिक की आपूर्ति करते हैं। वर्तमान युद्ध के कारण इन पारंपरिक मार्गों से आपूर्ति बाधित होने के खतरे को देखते हुए सरकार ने आयात के नए गंतव्यों की तलाश तेज कर दी है। ट्रंप टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितताओं और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच भारत का यह रणनीतिक कदम कारगर साबित हो रहा है। सरकार के इन कड़े फैसलों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक सक्रियता का उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की रसोई को युद्ध की तपिश से बचाना है। जहां एक ओर घरेलू उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर नए वैश्विक साझेदारों से मिल रही अतिरिक्त मदद ने भविष्य की अनिश्चितताओं को काफी हद तक कम कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह किसी भी कीमत पर घरेलू एलपीजी की कमी नहीं होने देगी और संकट के इस दौर में कूटनीति तथा ठोस आर्थिक फैसलों के जरिए ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *