ग्वालियर। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय बैजू बावरा महोत्सव का शुभारंभ मंगलवार को भव्य आयोजन के साथ हुआ। उद्घाटन अवसर पर प्रख्यात शास्त्रीय गायक पद्मश्री उस्ताद वासीफुद्दीन डागर ने कहा कि ध्रुपद भारतीय शास्त्रीय संगीत की जननी है। ख्याल, ठुमरी और टप्पा जैसी शैलियाँ बाद में विकसित हुईं, लेकिन ध्रुपद की जड़ें अत्यंत प्राचीन और मजबूत हैं। उन्होंने कहा कि संगीत की बारीकियों को समझने से पहले साधक को अपने भीतर के ‘स’ को खोजने का प्रयास करना चाहिए।
उस्ताद डागर ने बताया कि ग्वालियर का ध्रुपद से ऐतिहासिक संबंध रहा है और यहाँ की संगीत परंपरा सदैव देशभर में सम्मानित रही है। उन्होंने निजी टीवी चैनलों और मीडिया से शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की, ताकि युवा पीढ़ी इस परंपरा से जुड़ सके।
कार्यक्रम में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से आईं लावण्य कीर्ति सिंह मुख्य अतिथि रहीं। उन्होंने कहा कि ग्वालियर संगीत की नगरी है और इसके बिना भारतीय शास्त्रीय संगीत की कल्पना अधूरी है। उन्होंने कहा कि भारतीय संगीत परंपराएँ परंपरागत होते हुए भी निरंतर विकसित हो रही हैं।
संगोष्ठी में नई दिल्ली से आए पं. मोहन श्याम शर्मा ने ‘ताल धमार’ और पखावज की विशिष्टताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ताल धमार अन्य तालों से भिन्न है और पखावज तथा तबले की प्रस्तुति शैली में स्पष्ट अंतर है। इस अवसर पर उन्होंने ताल धमार में प्रभावशाली पखावज वादन प्रस्तुत किया, जिसमें अब्दुल हमीद ने संगति दी।
कार्यक्रम में संगीत विभाग के छात्र-छात्राओं ने बैजू बावरा रचित राग जौनपुरी में चौताल पर मनोहारी प्रस्तुति दी। पखावज पर जयवंत गायकवाड़ और युवा कलाकार योगिनी तांबे ने राग भूपाली में द्रुत लय की प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
समापन प्रस्तुति में उस्ताद वासीफुद्दीन डागर ने राग मुल्तानी में नोम-तोम आलाप और बैजू बावरा की बंदिश “बंसीधर पिनाकधार…” प्रस्तुत की, पखावज पर पं. मोहन श्याम शर्मा की संगति ने इसे और भव्य बना दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरु प्रो. सिमा सहस्रबुद्धे ने की, संचालन डॉ. पारुल दीक्षित ने किया। इस अवसर पर प्रो. नीरज कुमार झा, डॉ. आशुतोष खरे, अरुण सिंह चौहान सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। तीन दिवसीय यह महोत्सव ग्वालियर की समृद्ध संगीतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम बन रहा है।
