नई दिल्ली
अगले 30 सालों में डायबिटीज भारत की अर्थव्यवस्था पर दूसरा सबसे बड़ा बोझ होगी
भारत में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 10 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और यदि मौजूदा रफ्तार बनी रही तो 2030 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती है। एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने इस संकट को और भी गंभीर बताया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगले 30 सालों में डायबिटीज भारत की अर्थव्यवस्था पर दूसरा सबसे बड़ा बोझ बन सकती है।
यह अध्ययन 204 देशों में डायबिटीज के आर्थिक प्रभाव का विश्लेषण करके तैयार किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक अगले तीन दशकों में डायबिटीज वैश्विक अर्थव्यवस्था पर करीब 10 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ डालेगी। इसमें सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान अमेरिका, भारत और चीन को होगा। अमेरिका पर यह बोझ करीब 2.5 ट्रिलियन डॉलर का होगा, जबकि भारत को करीब 1.6 ट्रिलियन डॉलर और चीन को 1 ट्रिलियन डॉलर तक खर्च करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में डायबिटीज के मामलों में बढ़ोतरी का ग्राफ बेहद चिंताजनक है। दो-तीन दशक पहले तक देश में संक्रामक बीमारियां जैसे कॉलरा, टाइफाइड, मलेरिया और डेंगू प्रमुख स्वास्थ्य चुनौती थीं, लेकिन 2000 के बाद तेज शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के साथ नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज़ का विस्फोट हुआ। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2000 में डायबिटीज के मरीजों की संख्या 3.2 करोड़ थी, जो 2007 तक दोगुनी हो गई। 2017 में यह आंकड़ा 7.3 करोड़ तक पहुंच गया और अब अनुमान है कि 10 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि बड़ी आबादी प्री-डायबिटीज की स्थिति में है और उन्हें अपनी बीमारी का पता तक नहीं है।
विशेषज्ञों के मुताबिक इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। पारंपरिक भारतीय भोजन, जो कभी फाइबर और मोटे अनाज से भरपूर था, धीरे-धीरे रिफाइंड और प्रोसेस्ड फूड से बदल गया। बीते दो दशकों में पैकेज्ड फूड, मैदा, चीनी, रिफाइंड तेल और जंक फूड का चलन तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही शारीरिक गतिविधियों में भारी कमी आई है। शहरी जीवनशैली, दफ्तरों में लंबे समय तक बैठकर काम करना और समय की कमी ने लोगों को निष्क्रिय बना दिया है। इसके अलावा बढ़ता तनाव, डिप्रेशन और प्रदूषण भी डायबिटीज जैसी क्रोनिक बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं। यह रिपोर्ट भारत के लिए चेतावनी है कि यदि समय रहते सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में ठोस बदलाव नहीं किए गए तो यह बीमारी लाखों जिंदगियां को प्रभावित करेगी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी गंभीर नुकसान पहुंचाएगी।
