दिल्ली/भोपाल
सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान
राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल वन्यजीव अभयारण्य में हो रहे अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मीडिया रिपोट्र्स और सीएसआर की रिपोर्टों के आधार पर मामले का स्वत: संज्ञान लिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि संरक्षित क्षेत्रों में पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद रेत का अवैध खनन और परिवहन जारी है, जो लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए काल बन रहा है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने बेहद गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा जिन क्षेत्रों में घडिय़ालों को छोड़ा गया था, वे इलाके भी अब अवैध खनन की चपेट में आ गए हैं। खनन माफियाओं के डर और प्राकृतिक आवास के विनाश के कारण घडिय़ालों को विस्थापित होना पड़ रहा है। जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि हमने देखा है कि जिन संरक्षित क्षेत्रों में घडिय़ाल संरक्षण कार्यक्रम चल रहा है, वहां अंधाधुंध खनन हो रहा है। इसके कारण घडिय़ालों को विस्थापित होना पड़ रहा है। मामला अब उचित दिशा-निर्देशों के लिए प्रधान न्यायाधीश के समक्ष भेजा जाएगा।
पारिस्थितिक तंत्र पर मंडरा रहा खतरा
चंबल अभयारण्य का 435 किलोमीटर लंबा क्षेत्र घडिय़ालों के अलावा रिवर डॉल्फिन, दुर्लभ कछुओं और पक्षियों का भी घर है। कोर्ट ने चिंता जताई कि संरक्षित क्षेत्र में रेत का परिवहन और खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है, फिर भी यह धड़ल्ले से जारी है। रेत इस पूरे ईको-सिस्टम का आधार है। इसके हटने से घडिय़ालों के प्रजनन और रहने की जगह खत्म हो रही है। अवैध खनन न केवल वन्यजीवों बल्कि पूरे पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ रहा है।
तीन राज्यों की सीमा पर स्थित है सेंसिटिव जोन
1979 में अधिसूचित राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के त्रिकोणीय क्षेत्र पर स्थित है। इसे मुख्य रूप से लुप्तप्राय घडिय़ालों को बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन अब यह माफियाओं की शरणस्थली बनता जा रहा है।
