इंदौर हादसे के बाद ग्वालियर की पेयजल व्यवस्था कटघरे में,पाईप लाइन ब्लॉकेज का रोबोट लगाएगा पता

ग्वालियर

इंदौर में दूषित पानी पीने से 20 लोगों की मौत ने पूरे मध्यप्रदेश की पेयजल व्यवस्था की सच्चाई उजागर कर दी है। यह हादसा केवल इंदौर तक सीमित नहीं, बल्कि उन तमाम शहरों के लिए चेतावनी है, जहां वर्षों से पुरानी पाइपलाइन, सीवर लीकेज और कमजोर निगरानी के सहारे लोगों को “शुद्ध पानी” पिलाने का दावा किया जा रहा है। इंदौर की घटना के बाद शुरू हुए प्रदेशव्यापी जांच अभियान ने ग्वालियर नगर निगम की कार्यप्रणाली और संसाधनों को भी सवालों के घेरे में ला दिया है। ग्वालियर में तिघरा बांध और बोरिंग से सप्लाई होने वाले पानी में आखिर कौन-सा बैक्टीरिया मौजूद है, इसकी पहचान तक नगर निगम की किसी भी लैब में संभव नहीं है।
इंदौर के जिन इलाकों में दूषित पानी से मौतें हुईं, वहां पानी के सैंपलों में फीकल कॉलीफार्म, ई-कोलाई, विनियो स्पीशीज और प्रोटोजोआ जैसे घातक बैक्टीरिया पाए गए थे। यह स्थिति पानी और सीवेज लाइन के इंटरसेक्शन, लीकेज और जर्जर नेटवर्क का सीधा परिणाम थी। इसी के बाद प्रदेश सरकार ने शहरी इलाकों में पानी और सीवेज लाइन की व्यापक जांच, ऑनलाइन मैपिंग और जियो टैगिंग का अभियान शुरू किया है। घनी आबादी और पुरानी सप्लाई वाले क्षेत्रों को चिन्हित किया जा रहा है और पाइपलाइन में ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए रोबोट तकनीक अपनाने की तैयारी है।
ग्वालियर में जांच व्यवस्था अधूरी-
ग्वालियर नगर निगम के पास मोतीझील स्थित तीन लैब हैं, लेकिन इनमें केवल यह जांच हो पाती है कि पानी में बैक्टीरिया है या नहीं। बैक्टीरिया किस प्रकार का है, यह पहचानने की सुविधा नहीं है। इसका अर्थ यह है कि यदि पानी में ई-कोलाई या फीकल कॉलीफार्म जैसे जानलेवा बैक्टीरिया हों, तो निगम उन्हें अपने स्तर पर प्रमाणित नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में एनएबीएल मान्यता प्राप्त निजी लैब पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे रिपोर्ट आने में समय लग जाता है और खतरा बना रहता है।
नगर निगम अधिकारियों के अनुसार, बैक्टीरिया की मौजूदगी की जांच में ही 48 घंटे लग जाते हैं। मोतीझील लैब में सैंपल को इंक्यूबेटर में 48 घंटे रखा जाता है, तब जाकर रिपोर्ट मिलती है। इसके अलावा पानी के 11 प्रकार के फिजिकल और केमिकल टेस्ट किए जा रहे हैं। 5 जनवरी तक 260 सैंपलों की जांच की गई, जिनकी रिपोर्ट ओके बताई गई है, हालांकि इनमें एनपीएन बैक्टीरिया ट्रेस होने की बात भी सामने आई है।
लंबे समय से शिकायतें, फिर भी अनदेखी क्यों?
ग्वालियर में गंदे पानी की शिकायतें कोई नई नहीं हैं। शहर के कई इलाकों में वर्षों से नलों से बदबूदार और मटमैला पानी आने की शिकायतें सामने आती रही हैं। रहवासी लगातार पार्षदों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाते रहे, लेकिन इन शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। सवाल यह है कि जब समय रहते चेतावनियां मिल रही थीं, तब नगर निगम और शासन-प्रशासन ने ठोस कदम क्यों नहीं उठाए?
सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक जवाबदेही को लेकर है। जिन जनप्रतिनिधियों ने सत्ता में रहते हुए खुद शहर में “नरक जैसे हालात” होने की बात कही थी, वही आज चुप्पी साधे बैठे हैं। विडंबना यह है कि गंदे पानी की सबसे अधिक शिकायतें उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र से सामने आती रही हैं। इंदौर हादसे के बाद भी न तो कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण आया और न ही जिम्मेदारी तय करने की पहल हुई।
एडवाइजरी और पोस्टर तक सीमित राहत-
इंदौर की घटना के बाद ग्वालियर नगर निगम ने एहतियातन एडवाइजरी जारी कर लोगों से पानी उबालकर पीने की अपील की है। रहवासी सोसायटियों और अपार्टमेंट में पोस्टर लगवाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब जांच व्यवस्था ही अधूरी है, तब केवल अपील और पोस्टर से लोगों की सेहत कैसे सुरक्षित रह सकती है?
नगर निगम सभापति मनोज तोमर ने पार्षदों के साथ बैठक कर गंदे पानी की समस्या पर चर्चा की और शिकायतें आयुक्त संघ प्रिय को सौंपीं। इसके बाद उपयंत्रियों और सहायक यंत्रियों को त्वरित निराकरण के निर्देश दिए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी पूरी तरह सुधरते नजर नहीं आ रहे।
प्रदेश स्तर पर अभियान, रोबोट से होगी जांच-
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अनुसार, इंदौर हादसे के बाद प्रदेश भर में 1176 लीकेज दुरुस्त किए गए हैं, 7619 पानी के नमूनों की जांच हुई है और 684 स्थानों पर ओवरहेड टैंक व जलस्रोतों की सफाई की गई है। अमृत रेखा ऐप के माध्यम से ग्वालियर सहित कई शहरों में पानी और सीवेज लाइन की जियो टैगिंग पूरी हो चुकी है।
भविष्य में पानी और सीवेज लाइन में लीकेज या ब्लॉकेज का पता लगाने के लिए पाइपलाइन में छोटे रोबोट उतारे जाएंगे। अभी किसी भी गड़बड़ी के लिए 100 से 200 मीटर तक खुदाई करनी पड़ती है, जिससे समय और धन दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही जलापूर्ति नेटवर्क में पानी की बर्बादी रोकने के लिए स्काडा सिस्टम का दायरा भी बढ़ाया जाएगा।
इंदौर हादसे ने साफ कर दिया है कि पेयजल व्यवस्था में लापरवाही सीधे जानलेवा हो सकती है। ग्वालियर में बैक्टीरियल जांच की आधुनिक सुविधा का अभाव अब केवल तकनीकी कमी नहीं, बल्कि गंभीर जनस्वास्थ्य संकट का संकेत है।
ग्वालियर की पेयजल जांच — हकीकत और खतरा-
तिघरा बांध और बोरिंग से होती है मुख्य जल आपूर्ति
नगर निगम की लैब में केवल बैक्टीरिया की मौजूदगी की जांच
ई-कोलाई, फीकल कॉलीफार्म जैसे बैक्टीरिया की पहचान नहीं
सामान्य रिपोर्ट आने में 48 घंटे का समय
एनएबीएल मान्यता प्राप्त निजी लैब पर निर्भर निगम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *