वॉशिंगटन
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है जहां कूटनीति के रास्ते लगभग बंद नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ किसी भी तरह के युद्धविराम की संभावना को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ईरान को मिट्टी में मिलाकर ही दम लेंगे। ट्रंप के इस सख्त रुख ने न केवल वैश्विक तेल बाजार में हलचल मचा दी है, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, जिनके दर्जनों व्यापारिक जहाज वर्तमान में संघर्ष क्षेत्र में फंसे हुए हैं।
शुक्रवार को व्हाइट हाउस से प्रस्थान करते समय राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने इरादे स्पष्ट करते हुए कहा कि वे बातचीत के लिए तैयार हो सकते हैं, लेकिन युद्धविराम का विकल्प उनके पास नहीं है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि जब आप दूसरे पक्ष की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करने की राह पर हों, तब युद्धविराम जैसा कोई शब्द नहीं रह जाता। ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि अमेरिका इस बार ईरानी सैन्य बुनियादी ढांचे को नेस्तनाबूद करने के लक्ष्य पर अडिग है। हालांकि, ईरान के मुख्य तेल निर्यात केंद्र खार्ग द्वीप पर संभावित हमले को लेकर उन्होंने सस्पेंस बरकरार रखा है।
ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने पर भी बेरुखी दिखाई है, जो दुनिया के कुल तेल और गैस प्रवाह के पांचवें हिस्से का मार्ग है। उन्होंने नाटो और अन्य वैश्विक शक्तियों पर निशाना साधते हुए कहा कि उनमें इस संकट में मदद करने का साहस नहीं है। साथ ही, उन्होंने चीन और जापान जैसे देशों को खुद आगे आकर इस जलमार्ग को खुलवाने की सलाह दी है। ट्रंप ने ब्रिटेन की भी आलोचना की और अपेक्षा जताई कि उन्हें अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में और अधिक तेजी से सहयोग करना चाहिए था।
इस युद्धप्रिय नीति का सीधा असर भारत पर पड़ता दिख रहा है। वर्तमान में भारत के कम से कम 22 जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। युद्धविराम नहीं की नीति के कारण यह क्षेत्र लंबे समय तक अशांत रह सकता है, जिससे न केवल तेल की कीमतें आसमान छूने का खतरा है, बल्कि भारतीय टैंकरों की सुरक्षित वापसी भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। भारत अब अपने ऊर्जा हितों और जहाजों को निकालने के लिए बैक-चैनल कूटनीति का सहारा ले रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि ट्रंप इस मामले में चीन को शामिल करना चाहते हैं, जबकि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के किसी भी बढ़ते दखल के खिलाफ है।
