पोहरी
संकल्प और श्रम की मिसाल: आदिवासी गांव ने खुद बनाया खेतों तक रास्ता
पोहरी तहसील से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित आदिवासी गांव अहेरा मङखेड़ा ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जो आत्मनिर्भरता और सामूहिक श्रम की ताकत को दर्शाती है। वर्षों से मूलभूत सुविधा खेतों तक पहुंचने के रास्ते के अभाव में जूझ रहे ग्रामीणों ने आखिरकार अपनी मेहनत और एकजुटता से इस समस्या का समाधान खुद ही कर लिया। गांव के पास स्थित ‘कछार’ क्षेत्र में अधिकांश ग्रामीणों के खेत हैं, लेकिन वहां तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं था। ऊँचे पहाड़, पथरीली घाटियां और घने झाड़-झंखाड़ से भरे इस रास्ते पर बरसात के दिनों में हालात और भी बदतर हो जाते थे। स्थिति इतनी खराब थी कि ट्रैक्टर जैसे वाहन भी वहां तक नहीं पहुंच पाते थे, जिससे किसानों को बैलों के सहारे पारंपरिक खेती करने को मजबूर होना पड़ता था।सबसे ज्यादा परेशानी फसल तैयार होने के बाद होती थी, जब महिलाओं और पुरुषों को अनाज की भारी बोरियां सिर पर रखकर खतरनाक रास्तों से मुख्य मार्ग तक लानी पड़ती थीं। कई वर्षों तक प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो ग्रामीणों ने खुद ही हालात बदलने का संकल्प लिया। गांव के ‘विकास समूह’ की बैठकों में इस दिशा में पहल की गई। समूह के सदस्य तेज सिंह आदिवासी ने सभी को एकजुट करते हुए समझाया कि यदि रास्ता बन जाए तो खेती आसान हो जाएगी। वहीं तारा बाई ने महिलाओं को संगठित कर इस अभियान को नई ताकत दी।
5 साल पहले बनाया था सामूहिक श्रम से रास्ता
हालांकि ग्रामीणों ने करीब 5 साल पहले भी सामूहिक श्रम से रास्ता बनाया था, लेकिन हाल की बारिश ने उसे फिर से क्षतिग्रस्त कर दिया। इस बार गांव के बुजुर्ग लम्पी आदिवासी के मार्गदर्शन में पूरे गांव ने आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला किया। गांव के हर घर से लोग हाथों में गेंती, फावड़े और सब्बल लेकर निकल पड़े। लगातार 6 दिनों तक चले इस श्रमदान में ग्रामीणों ने कंटीली झाड़ियों को हटाया, बड़े पत्थरों को साफ किया और पहाड़ की कठोर जमीन को समतल कर दिया। यह सिर्फ रास्ता बनाने का काम नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान और संघर्ष की कहानी थी। आखिरकार 6 दिनों की कड़ी मेहनत रंग लाई और घाटियों के बीच एक सुगम रास्ता तैयार हो गया। अब ट्रैक्टर आसानी से खेतों तक पहुंच रहे हैं, जिससे किसानों का समय और मेहनत दोनों बच रहे हैं। महिलाओं को भी अब भारी बोझ ढोने से राहत मिल गई है। अहेरा मङखेड़ा का यह प्रयास साबित करता है कि जब लोग एकजुट होकर ठान लें, तो कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती। यह गांव आज आत्मनिर्भरता और सामूहिक शक्ति की प्रेरणादायक मिसाल बन चुका है।

